हिन्द स्वराज्य | Hind svarajya

By: मोहनदास करमचंद गांधी - Mohandas Karamchand Gandhi


दो शब्द :

इस पाठ में महात्मा गांधी की पुस्तक "हिंद-स्वराज्य" का परिचय और उसकी प्रमुखता का उल्लेख किया गया है। लार्ड लोदियन ने गांधीजी से कहा कि इस पुस्तक को बार-बार पढ़ना चाहिए ताकि उनके उपदेशों को सही ढंग से समझा जा सके। सोफिया वाडिया ने भी इस पुस्तक के महत्व पर जोर दिया और इसे जनसाधारण में फैलाने की आवश्यकता बताई। यह पुस्तक 1908 में गांधीजी द्वारा लिखी गई थी, जब वे लंदन से लौट रहे थे। इसमें अहिंसा और आत्मबल के सिद्धांतों पर चर्चा की गई है, और यह हिंसात्मक क्रांति के खिलाफ एक वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। गांधीजी ने 1921 में कहा था कि यह पुस्तक द्वेष के बजाय प्रेम की शिक्षा देती है और इसमें आधुनिक सभ्यता की आलोचना की गई है। गांधीजी ने स्पष्ट किया कि उनका लक्ष्य उस स्वराज्य का नहीं है, जैसा पुस्तक में वर्णित है, क्योंकि वे मानते हैं कि भारत अभी उसके लिए तैयार नहीं है। उन्होंने पुस्तक को पाठकों के सामने बिना किसी संशोधन के प्रस्तुत करने का निर्णय लिया, ताकि लोग सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों को समझ सकें। पाठ में यह भी बताया गया है कि गांधीजी ने इस पुस्तक को सस्ते दाम पर प्रकाशित करने की अपील की, ताकि अधिक से अधिक लोग इसे पढ़ सकें। इसके बाद, गांधीजी ने स्वराज्य की भावना के बारे में चर्चा की है और नेशनल कांग्रेस के महत्व को रेखांकित किया है। उन्होंने बताया कि स्वतंत्रता की इस भावना को जागृत करने में कई महापुरुषों ने योगदान दिया है। इस प्रकार, पाठ में "हिंद-स्वराज्य" की विचारधारा, उसके लेखक गांधीजी का दृष्टिकोण, और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में इसकी भूमिका का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया गया है।


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