कथासरित्सागर (प्रथम खंड) | katha Saritsagar (Khand-1)

By: सोमदेव भट्ट - Somdev Bhatt
कथासरित्सागर (प्रथम खंड) | katha Saritsagar (Khand-1) by


दो शब्द :

कथासरित्सागर, महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा रचित एक महत्वपूर्ण साहित्यिक ग्रंथ है, जो कहानी-साहित्य का शिरोमणि माना जाता है। यह ग्रंथ कश्मीर में राजा अनन्त की रानी सूर्यमती के मनोविनोद के लिए 1063 से 1081 ईस्वी के बीच लिखा गया था। इसमें 21,388 पद्म हैं और इसे 124 तरंगों में विभाजित किया गया है। इसके अलावा, ग्रंथ में 18 लम्बक भी हैं, जो विभिन्न कहानियों का संग्रह प्रस्तुत करते हैं। सोमदेव ने इस ग्रंथ को 'कथा-रूपी नदियों का सागर' कहा है और इसे अनेक कथाओं के अमृत की खान माना है। यह ग्रंथ बृहत्कथा नामक एक प्राचीन ग्रंथ का सार है, जिसे गुणाढ्य ने लिखा था। बृहत्कथा की रचना के समय में व्यापारियों और समुद्री यात्रियों के अनुभवों पर आधारित कहानियाँ प्रचलित थीं। कथासरित्सागर के महत्व को समझने के लिए बृहत्कथा और इसके विभिन्न रूपांतरों का ज्ञान आवश्यक है। बृहत्कथा मूलतः कामकथा के रूप में जानी जाती थी, जिसमें नायक नरवाहनदत्त के विवाहों की कहानियाँ शामिल थीं। सोमदेव ने कथासरित्सागर में इस परंपरा को आगे बढ़ाया और अपनी लेखनी के माध्यम से इसे नया रूप दिया। इस ग्रंथ का अनुवाद पंडित केदारनाथ शर्मा सारस्वत ने किया था, लेकिन उनका देहावसान होने के कारण वे इसे पूरा नहीं कर सके। परिषद ने इसे तीन खंडों में प्रकाशित करने का निर्णय लिया है। यह ग्रंथ भारतीय साहित्य में एक अमूल्य धरोहर के रूप में मान्यता प्राप्त कर चुका है और पाठकों को इसकी कहानियों से आनंदित करने की उम्मीद है।


Please share your views, complaints, requests, or suggestions in the comment box below.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *