समकालीन भारतीय समाज | Samkalin Bhartiya Samaj

By: कृष्ण गोपाल - Krishnan Gopal नदीम हसनैन - Nadeem Hasnain


दो शब्द :

पुस्तक "समकालीन भारतीय समाज: एक समाजशास्त्रीय परिदृश्य" की प्रस्तावना में लेखक प्रो. नदीम हसनैन ने भारतीय समाज के अध्ययन में मौजूदा साहित्य की कमी और आवश्यकताओं पर प्रकाश डाला है। उन्होंने उल्लेख किया है कि भारतीय समाज पर समग्र रूप से एक पुस्तक लिखना चुनौतीपूर्ण है क्योंकि यह विषय विविधताओं और जटिलताओं से भरा हुआ है। इस पुस्तक में समाजशास्त्र और सामाजिक मानवशास्त्र के गहन विश्लेषण प्रस्तुत किए गए हैं, विशेषकर निरंतरता और परिवर्तन के संदर्भ में। लेखक ने इस पुस्तक को विश्वविद्यालय स्तर के छात्रों के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उपयोगी बनाने का प्रयास किया है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि कुछ विषयों को विस्तार से नहीं बताया गया है, जो कि स्थान की सीमाओं के कारण है। इसके अलावा, वे पाठकों से प्रतिक्रिया और सुझावों की अपेक्षा करते हैं ताकि पुस्तक की उपयोगिता बढ़ाई जा सके। पुस्तक में भारतीय समाज के ऐतिहासिक बंधनों, सांस्कृतिक गतिशीलता, ग्रामीण समाज, सामाजिक स्तरीकरण, धर्म और धार्मिक समुदायों, तथा महिलाओं के अधिकारों पर गहन चर्चा की गई है। इसमें सामाजिक आंदोलनों, जाति व्यवस्था, और सामाजिक न्याय जैसे विषयों का भी समावेश किया गया है। इस प्रकार, यह पुस्तक भारतीय समाज के समकालीन परिदृश्य को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत है।


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