जैन तंत्र शास्त्र | Jain Tantra Shastra

By: राजेश दीक्षित - Rajesh Dixit
जैन तंत्र शास्त्र | Jain Tantra Shastra by


दो शब्द :

इस पाठ में जैन धर्म के तीन मुख्य ग्रंथों का संकलन किया गया है, जो हैं: चतुविशतितोर्थकर अनाहत मन्त्र-यन्त्र विधि, श्री कल्याण मन्दिर स्तोत्र, और भवतामर स्तोत्र। इन ग्रंथों में संबंधित ऋद्धि, मन्त्र-यन्त्र, साधन विधि, और ग्रभावाद का उल्लेख किया गया है। श्री १०८ गणयरावबार्य श्री झुशुसागर जी महाराज द्वारा चतुविशतितोर्थकर अनाहत मन्त्र-यन्त्र विधि का पहला हिंदी अनुवाद प्रस्तुत किया गया है, जिसे समाज ने सराहा। कल्याण मन्दिर स्तोत्र, जो मानव-यत्याण का मन्दिर है, जैन धर्म के दोनों सम्प्रदायों में महत्वपूर्ण है। इसका रचना काल ग्याग्हवी शताब्दी के बाद का माना जाता है। भवतामर स्तोत्र के रचयिता की पहचान निश्चित नहीं है, लेकिन इसे विक्रमादित्य के समय का माना जाता है। मन्त्र-यन्त्र साधना का महत्व और इसकी विधियों का उल्लेख किया गया है। जैन धर्म में मन्त्र-यन्त्र का प्रयोग साधकों द्वारा आत्मस्वरूप की प्राप्ति के लिए किया जाता है। इसके साथ ही, यह बताया गया है कि मन्त्र-यन्त्र की साधना के लिए कुछ आवश्यक निर्देश हैं, जो साधकों को ध्यान में रखने चाहिए। साधक को मन्त्र का जप करते समय गुरु की कृपा का ध्यान रखना चाहिए और साधना के समय मन की एकाग्रता आवश्यक है। इसके अलावा, साधना के लिए स्थान और समय का भी विशेष महत्व है। पाठ के अंत में, विभिन्न मन्त्र-यन्त्रों की सूची दी गई है, जो साधकों को उनके उद्देश्यों के अनुसार सहायता प्रदान करने में सहायक हो सकते हैं। इस ग्रंथ के सम्पादन में कई विद्वानों और ग्रंथों की सहायता ली गई है, और विशेष रूप से श्री यतीन्द्रकुमार जैन शास्त्री का उल्लेख किया गया है, जिनका योगदान महत्वपूर्ण था।


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