भारतीय अर्थ व्यवस्था | Bhartiya Arth Vyavastha

By: के. पी. एम. सुन्दरम - K. P. M. Sundarm रुद्र दत्त - Rudra Datt
भारतीय अर्थ व्यवस्था | Bhartiya Arth Vyavastha by


दो शब्द :

यह पाठ भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास और सुधारों पर केंद्रित है। लेखक रुद्र दत्त और के. पी. एम. सुन्द्रम ने इस पुस्तक के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था की समस्याओं, सुधारों और नीतियों की समीक्षा की है। पुस्तक के उनतीसवें संस्करण की भूमिका में यह बताया गया है कि भारत में आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया 1991 में शुरू हुई, जब नई औद्योगिक नीतियों के तहत कई क्षेत्रों को निजी क्षेत्र के लिए खोला गया। इसके अलावा, विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए विभिन्न रियायतें दी गईं। 1998 के आम चुनाव के बाद, भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने एक राष्ट्रीय एजेंडा पेश किया, जिसका लक्ष्य स्वदेशी पर बल देना और रोजगार सृजन करना था। सरकार ने विकास दर बढ़ाने और राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने का उद्देश्य रखा। हालांकि, 1997-98 के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था में कई समस्याएं आईं, जैसे कृषि वृद्धि दर का गिरना, औद्योगिक वृद्धि में कमी और बढ़ता व्यापार घाटा। इसके अलावा, भारत द्वारा नाभिकीय परीक्षण करने के बाद अमेरिका और जापान से विदेशी निवेश में कमी आई, जिससे विकास की समस्या और भी गंभीर हो गई। पुस्तक में कई नए अध्याय जोड़े गए हैं, जिसमें राष्ट्रीय एजेंडा, नौवीं पचवर्षीय योजना, जनसंख्या प्रक्षेपण और रोजगार नीति का उल्लेख है। लेखक ने इस पुस्तक को छात्रों और शिक्षकों के लिए उपयोगी बनाने का प्रयास किया है, ताकि वे भारतीय अर्थव्यवस्था की चुनौतियों और विकास के उपायों को समझ सकें। इस प्रकार, यह पुस्तक भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास, सुधारों और उनके प्रभावों का एक समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।


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