श्री पाण्डव पुराण | Shri Pandav Puran

By: श्री निवासजी जैन शास्त्री - Shri Nivasji Jain Shastri


दो शब्द :

यह पाठ "पांडव पुराण" का एक भाग है, जिसमें लेखक ने अपने ग्रंथ की रचना प्रक्रिया और विचारों को प्रस्तुत किया है। लेखक ने इस ग्रंथ के लिखने के पीछे की प्रेरणा के साथ-साथ अपने प्रयासों को साझा किया है। उन्होंने उल्लेख किया है कि यह ग्रंथ जैन धर्म के महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है और इसे संस्कृत में लिखा गया है। लेखक ने ग्रंथ के अध्ययन की आवश्यकता को महसूस किया और इस दिशा में कदम बढ़ाया। उन्होंने अपने कार्य में सहायता के लिए पूर्व के विद्वानों और ग्रंथों का उल्लेख किया है। इसके साथ ही, लेखक ने अपने लेखन में संभावित भूलों के लिए पाठकों से क्षमा भी मांगी है। पाठ में जैन धर्म के सिद्धांतों और उनके महत्व पर भी प्रकाश डाला गया है। लेखक ने विभिन्न तीर्थंकरों का स्मरण किया और उनके गुणों का गुणगान किया। उन्होंने यह भी बताया है कि उनका यह प्रयास ज्ञान की प्राप्ति और जैन धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए है। अंत में, लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि उनका यह साहसिक प्रयास, भले ही असामान्य हो, लेकिन यह धर्म और ज्ञान के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। वे पाठकों को इस ग्रंथ के माध्यम से जैन धर्म की गहराइयों में उतरने का आमंत्रण दे रहे हैं।


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