आदर्श पुरुष का दर्शन | Aadarsh Purush ka Darshan

By: श्रीपाद दामोदर सातवल्ठेकर - Shreepad Damodar Satvelthekar


दो शब्द :

इस पाठ में वेदों के सिद्धांतों के आधार पर समाज और व्यक्ति के संबंध को समझाया गया है। वेदिक अर्थव्यवस्था का मुख्य तत्त्व यह है कि व्यक्ति समाज का हिस्सा है और उसका धन समाज का धन है। व्यक्ति का जीवन समाज पर निर्भर करता है, और उसे समाज के लिए अपने धन का त्याग करना चाहिए। वेदों में यह कहा गया है कि धन किसी एक व्यक्ति का नहीं है, बल्कि यह प्रजा का है और इसका उपयोग सामूहिक भलाई के लिए होना चाहिए। व्यक्तिगत स्वार्थ और लोभ से बचने की सलाह दी गई है। पाठ में यह भी बताया गया है कि व्यक्ति का समाज के प्रति कर्तव्य है, और उसे अपने परिवार, राष्ट्र और समाज के लिए योगदान देना चाहिए। व्यक्तियों की भलाई समाज की भलाई में निहित है, और इसलिए, व्यक्ति को समाज के प्रति अपने ऋण को चुकाना चाहिए। इस संदर्भ में, पाठ में 'इंशा वास्यं इदं सर्व यत् किच' का उल्लेख किया गया है, जिसका अर्थ है कि जो कुछ भी है, उसका स्वामित्व शक्तिशाली के पास होना चाहिए। यह सिद्धांत यह दर्शाता है कि स्वामित्व और शासन केवल उन लोगों के पास होना चाहिए जिनमें सामर्थ्य है। संक्षेप में, यह पाठ वेदिक सिद्धांतों की व्याख्या करता है, जिसमें समाज और व्यक्ति के बीच का संबंध, धन का समाज के लिए उपयोग, और व्यक्तिगत त्याग का महत्व बताया गया है।


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