भ्रमर गीत-सार | Bhramar Geet-Sar

- श्रेणी: काव्य / Poetry भक्ति/ bhakti हिंदी / Hindi
- लेखक: माया अग्रवाल - Maya Agarwal
- पृष्ठ : 722
- साइज: 28 MB
- वर्ष: 1977
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दो शब्द :
महाकवि सूरदास का योगदान भक्तिकालीन साहित्य में अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनकी काव्य-रचना "भ्रमर-गीत" 400 उत्कृष्ट पदों का संकलन है, जिसमें मानव हृदय की गहरी पहचान और भावनाओं का अद्भुत चित्रण किया गया है। इस पुस्तक में सूरदास के काव्य के विभिन्न पहलुओं की विस्तृत व्याख्या की गई है, जिसमें कठिन शब्दों के अर्थ भी शामिल हैं, ताकि अध्ययन में सहूलियत हो। सूरदास के काव्य में प्रतीकों का प्रयोग महत्वपूर्ण है, विशेषकर "भ्रमर" प्रतीक का जो नारी-पुरुष संबंधों की व्याख्या करता है। यह प्रतीक नारी की कोमलता और पुरुष की रसलोलुपता को दर्शाने के लिए उपयोग किया जाता है। ऐतिहासिक दृष्टि से, भारतीय साहित्य में यह प्रतीक नारी की भावनाओं को उजागर करने में सहायक रहा है। कविता के माध्यम से सूरदास ने कृष्ण और गोपियों के प्रेम को अत्यंत गहराई से व्यक्त किया है, जिसमें प्रेम, विरह और निष्ठा की जटिलताएँ शामिल हैं। गोपियों की कड़वी अनुभूतियों और प्रेम की अनन्यता को सूरदास ने अत्यंत प्रभावी ढंग से चित्रित किया है। इस प्रकार, "भ्रमर-गीत" न केवल सूरदास की काव्य प्रतिभा का परिचायक है, बल्कि यह हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह पुस्तक न केवल छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए, बल्कि साहित्य lovers के लिए भी अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी।
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