उत्तरी भारत की संत- परंपरा | Uttari Bharat Ki Sant Parampara

- श्रेणी: Vedanta and Spirituality | वेदांत और आध्यात्मिकता भक्ति/ bhakti
- लेखक: परशुराम चतुर्वेदी - Parashuram Chaturvedi
- पृष्ठ : 955
- साइज: 81 MB
- वर्ष: 1972
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दो शब्द :
इस पाठ में 'उत्तरी भारत की संत-परंपरा' पर चर्चा की गई है, जिसमें संतों और भक्तों के बीच के संबंध, उनके विचार और साधना पद्धतियों का विश्लेषण किया गया है। लेखक ने इस पुस्तक के पहले संस्करण के प्रति मिली प्रतिक्रियाओं और आलोचनाओं का उल्लेख किया है, जिसमें संतों और भक्तों के बीच भेदभाव का आरोप भी शामिल था। लेखक ने संतों के योगदान, उनके जीवन और उनकी शिक्षाओं के महत्व को रेखांकित किया है। उन्होंने संतों की साधना को केवल साधन नहीं, बल्कि साध्य की ओर ले जाने वाली प्रक्रिया बताया है, जिसमें सत्य की अनुभूति का महत्व है। संतों के विचारों को समाज के लिए आवश्यक बताया गया है, और उन्होंने संतों की शिक्षाओं को आज के समाज में भी प्रासंगिक ठहराया है। पुस्तक में संतों के जीवन से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर नई सामग्री और संशोधन किए गए हैं। संतों की परंपरा के अध्ययन की आवश्यकता और महत्व को बताते हुए, लेखक ने संतों के व्यक्तित्व और उनके योगदान को गहराई से समझने का आग्रह किया है। उन्होंने संतों के विचारों को व्यक्तिवादी न मानकर, समाज और विश्व के एक अंग के रूप में देखने की बात की है। अंत में, लेखक ने संतों की सफलताओं और असफलताओं पर चर्चा करते हुए, समाज के सुधार में उनके योगदान का मूल्यांकन किया है। उन्होंने संतों को केवल एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति के सुधारक के रूप में देखने की आवश्यकता पर बल दिया है। इस प्रकार, यह पाठ संत-परंपरा के अध्ययन के महत्व और संतों के विचारों के प्रति एक नई दृष्टि प्रस्तुत करता है।
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