निर्बन्ध महासमर -८ | Nirbandh Mahasamar -8

- श्रेणी: उपन्यास / Upnyas-Novel साहित्य / Literature
- लेखक: नरेन्द्र कोहली - Narendra Kohali
- पृष्ठ : 276
- साइज: 13 MB
- वर्ष: 1991
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दो शब्द :
यह पाठ नरेन्द्र कोहली के निबंध "महासमर-6" से लिया गया है, जिसमें द्रोण और उनके पुत्र अश्वत्थामा के बीच की संवाद का वर्णन किया गया है। कहानी की शुरुआत में, द्रोण अपने पुत्र अश्वत्थामा से बात करते हैं। अश्वत्थामा, जो द्रोण के लिए एक उत्साही और सम्मानित पुत्र है, अपने पिता की गंभीरता को देखकर चिंतित होता है। द्रोण भीष्म के धराशायी होने की बात करते हैं, जिससे अश्वत्थामा को लगता है कि यह उनके लिए एक अवसर है। लेकिन द्रोण इस बात को गंभीरता से लेते हैं और अपने अतीत को याद करते हैं। वे अश्वत्थामा से सवाल करते हैं कि उन्होंने हस्तिनापुर आने का निर्णय क्यों लिया, यह बताते हुए कि वे प्रतिशोध लेना चाहते थे, लेकिन युद्ध करने का इरादा नहीं था। द्रोण ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने अर्जुन को युद्ध के लिए तैयार किया था, लेकिन उन्हें उसके जीतने पर विश्वास नहीं था। अश्वत्थामा द्रोण के विचारों को समझने की कोशिश करता है, लेकिन द्रोण अपने अहंकार और अपमान की भावना को व्यक्त करते हैं। वे एकलव्य के अँगूठे की घटना को उद्धृत करते हैं, जिसमें उन्होंने अपने शिष्य के कौशल से खतरा महसूस किया और उसे अपमानित करने का निर्णय लिया। द्रोण अपने भीतर की द्वंद्व को व्यक्त करते हैं, यह बताते हुए कि उन्हें युद्ध की वास्तविकता का अनुभव नहीं था और वे भीष्म की छाया में सुरक्षित रहना चाहते थे। अब जब भीष्म युद्ध में नहीं हैं, तब उन्हें अपनी क्षमता पर संदेह होता है। अश्वत्थामा अपने पिता को आश्वस्त करने की कोशिश करता है, लेकिन द्रोण जानते हैं कि युद्ध में खतरे की स्थिति हमेशा बनी रहती है। अंततः, द्रोण अपनी चिंताओं को व्यक्त करते हैं और अपने पुत्र के प्रति अपनी चिंता को उजागर करते हैं, यह दर्शाते हुए कि पिता की चिंता हमेशा अपने बच्चों के लिए होती है। इस संवाद में द्रोण का आंतरिक संघर्ष, उनका अहंकार, और पिता-पुत्र के रिश्ते की गहराई को उजागर किया गया है। यह पाठ युद्ध के पीछे छिपे
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