काय - चिकित्सा | Kaya Chikitsa

By: विद्याधर शुक्ल - Vidyadhar Shukla
काय - चिकित्सा  | Kaya Chikitsa by


दो शब्द :

इस पाठ में आयुर्वेद के महत्वपूर्ण अंग 'कायचिकित्सा' का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसे आयुर्वेद का सर्वोत्तम भाग माना जाता है, जिसमें स्वस्थ व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगियों की पीड़ा का निवारण करने के लिए चिकित्सा के विभिन्न उपायों का उल्लेख किया गया है। आचार्य चरक ने इस चिकित्सा प्रणाली के दो प्रमुख प्रयोजनों का उल्लेख किया है: 1. स्वस्थ व्यक्ति का स्वास्थ्य संरक्षण और 2. रोगी की पीड़ा का शमन। इसे पूरा करने के लिए उन्होंने तीन मुख्य सूत्र दिए हैं: सशोधन, सशमन और निदानपरिवर्जन। सशोधन को सबसे अधिक महत्व दिया गया है, क्योंकि यह रोगोत्पादक दोषों को समाप्त करने में मदद करता है। सशोधन के लिए 'पंचकर्म' की प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है, जिससे शरीर से विषैले तत्वों और दोषों का निष्कासन होता है। यह प्रक्रिया न केवल स्वस्थ व्यक्तियों के लिए, बल्कि रोगियों के लिए भी लाभकारी है। पंचकर्म के अंतर्गत विभिन्न उपचार विधियाँ शामिल हैं, जैसे कि वमन, विरेचन, वस्ति आदि। इसके अलावा, रसायन चिकित्सा का भी उल्लेख किया गया है, जो दीर्घायु, ऊर्जा, और मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ाने में सहायक होती है। रसायन चिकित्सा व्यक्ति को स्वस्थ, युवा और मानसिक रूप से प्रबल बनाती है। अंत में, वाजीकरण का विषय भी महत्वपूर्ण है, जो संतानों की उत्पत्ति और उनके स्वास्थ्य को नियंत्रित करने में सहायक होता है। यह विषय आयुर्वेद का एक स्वतंत्र भाग माना गया है और इसका उद्देश्य मानव जीवन में प्रेम और संतानों की उत्पत्ति को उचित दिशा में ले जाना है। इस प्रकार, इस पाठ में कायचिकित्सा के तीन महत्वपूर्ण पहलुओं: पंचकर्म, रसायन, और वाजीकरण का विस्तृत विवेचन किया गया है, जो आयुर्वेद की चिकित्सा पद्धति के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। पाठ के लेखक ने इसे चिकित्सा छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए प्रस्तुत किया है, ताकि वे इन विषयों का गहन अध्ययन कर सकें।


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