किरातार्जुनीय महाकाव्य | Kiratarjuniy Mahakavya

By: महाकवि भारवि - Mahakavi Bharavi
किरातार्जुनीय महाकाव्य | Kiratarjuniy Mahakavya by


दो शब्द :

किरातार्जुनीय महाकाव्य संस्कृत साहित्य में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसे महाकवियों की 'बृहसत्त्रयी' में पहला स्थान प्राप्त है और इसके काव्य-शिल्प की उत्कृष्टता इसे अन्य महाकाव्यों से अलग बनाती है। कवि भारवि ने इस काव्य में शब्दों की सरलता और अर्थ की गहराई के साथ-साथ काव्य की कला को भी ध्यान में रखा है। कविता में नैतिकता, सदाचार और लोकनीति के महत्वपूर्ण पहलुओं को उजागर किया गया है। यह महाकाव्य वीर रस पर आधारित है और इसकी कथा अर्जुन की तपस्या और इन्द्र की परीक्षा के इर्द-गिर्द घूमती है। कवि ने कथा के पात्रों को अत्यंत विचारशील और शान्तिपूर्ण रूप में प्रस्तुत किया है, जिससे उनकी बातों में गहराई और स्थिरता दिखाई देती है। किरातार्जुनीय में वर्णित रस और भावनाएँ पाठक को आकर्षित करती हैं और यह काव्य विभिन्न श्लोकों और छंदों में निबद्ध है। इसकी रचनाएँ संगीतात्मक ध्वनि और सरलता से भरी हुई हैं, जो पाठकों के मन में गहरी छाप छोड़ती हैं। इस महाकाव्य में उपस्थित श्लोकों में कवि ने गहन अर्थों और भावनाओं को समाहित किया है। कवि की मान्यता है कि कविता केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि अर्थ और सौंदर्य का समन्वय है। इस प्रकार, किरातार्जुनीय वस्तुतः एक अद्वितीय काव्य कृति है, जो न केवल काव्य प्रेमियों के लिए, बल्कि सभी पाठकों के लिए एक प्रेरणा स्रोत है।


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