रसिक प्रिया | Rasik Priya

By: केशवदास - Keshavdas
रसिक प्रिया | Rasik Priya by


दो शब्द :

आचार्य केशवदास हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण कवियों में से एक हैं, जिन्हें उनके काव्य और रचनाओं के लिए जाना जाता है। उनकी कृतियों का अध्ययन और विश्लेषण समय के साथ बदलता रहा है। केशवदास का महत्त्व मध्यकालीन हिंदी काव्य में अद्वितीय है, लेकिन उन्हें कई बार उपेक्षित भी किया गया। उनके काव्य में कठिनाई और जटिलता के कारण उन्हें 'कठिन काव्य के प्रेत' कहा जाता है, जिससे उनकी रचनाएँ आम पाठक और आलोचकों के बीच कम चर्चित रह गईं। केशवदास की प्रमुख रचना 'रामचंद्रचंद्रिका' है, जिसमें उन्होंने शास्त्रीय काव्य की पारंपरिक विशेषताओं को अपनाते हुए वर्णन और चमत्कार का प्रदर्शन किया है। हालांकि, उनकी रचनाएँ भाव-पक्ष की तुलना में कलापक्ष पर अधिक केंद्रित हैं। उन्होंने श्रृंगार, वीररस, और अन्य रसों की रचनाएँ की हैं जैसे 'रसिकप्रिया', 'कविप्रिया', 'नखशिख', आदि। उनका लेखन दरबारी जीवन का प्रतिबिंब है और उन्होंने अपने समय के सांस्कृतिक एवं साहित्यिक परिवेश को ध्यान में रखकर रचनाएँ कीं। केशवदास की काव्यकला में अलंकारों का प्रचुर प्रयोग देखने को मिलता है, जो उन्हें एक विशेष पहचान देता है। मध्यकालीन हिंदी साहित्य में केशवदास की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन उनके काव्य की कठिनाई और शास्त्रीयता के कारण वे धीरे-धीरे विस्मृत होते गए। उनके योगदान को समझने और पुनः जीवित करने की आवश्यकता है, ताकि उनकी काव्यकला को सही सम्मान मिल सके। उनके रचनात्मकता का अध्ययन न केवल हिंदी साहित्य के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह उस समय की सांस्कृतिक धाराओं को भी उजागर करता है।


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