तब की बात और थी | Tab Ki Baat Aur Thi

By: हरिशंकर परसाई - Harishankar Parsai
तब की बात और थी | Tab Ki Baat Aur Thi by


दो शब्द :

यह पाठ हरिशंकर परसाई के विचारों और उनके संग्रह "तब की बात और थी" का परिचय देता है। लेखक ने मनुष्य की परिभाषा पर विचार करते हुए यह कहा है कि मनुष्य चार पैरों वाला पशु है, जिसने अपने दो पैरों से चलना सीखा है। वे यह भी बताते हैं कि उनकी कहानियाँ सामाजिक और व्यक्तिगत समस्याओं को उजागर करती हैं। लेखक ने अपने पिछले संग्रहों की समीक्षाओं का जिक्र करते हुए कहा है कि समीक्षाएँ अक्सर पक्षपाती होती हैं, जिसमें अपने लोगों की प्रशंसा और दूसरों की निंदा की जाती है। वे यह भी स्वीकार करते हैं कि उनके व्यंग्य कटु होते हैं, लेकिन बुराई को दूर करने के लिए कठोरता आवश्यक है। संग्रह में विभिन्न प्रकार की रचनाएँ हैं, जैसे कहानियाँ, रेखाचित्र, और लघुकथाएँ। लेखक ने अपने सभी सहयोगियों का धन्यवाद किया है, जिन्होंने इस पुस्तक के प्रकाशन में सहायता की। कहानी "भेड़े और भेड़िये" में, वन के पशुओं ने एक नई शासन-व्यवस्था स्थापित करने का निर्णय लिया। भेड़ें, जो नेक और निर्दोष थीं, ने सोचा कि अब उनका भय समाप्त होगा, जबकि भेड़िये चिंतित थे कि उनके अस्तित्व पर खतरा आ जाएगा। बूढ़े सियार ने भेड़िये को सलाह दी कि वे चुनाव में जीतने के लिए एक योजना बनाएँ, जिससे भेड़िये सत्ता में रह सकें। यह कहानी सत्ता, छल, और सामाजिक संरचना पर व्यंग्य करती है, यह दर्शाते हुए कि कैसे कमजोर वर्ग अपनी सुरक्षा के लिए संघर्ष करता है। इस प्रकार, पाठ में लेखक की सामाजिक सच्चाइयों के प्रति दृष्टि और उनके व्यंग्य की गहराई का परिचय मिलता है।


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