पागल | Pagal

- श्रेणी: Health and Wellness | स्वास्थ्य नाटक/ Drama
- लेखक: शिवनाथ सिंग शांडिल्य - Shivnath Singh Shandilya
- पृष्ठ : 78
- साइज: 2 MB
- वर्ष: 1945
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दो शब्द :
कहानी "पागल" में खलील जिब्रान ने अपने जीवन के अनुभवों को एक गहरी और आध्यात्मिक दृष्टि से प्रस्तुत किया है। लेखक बताता है कि एक दिन जब वह गहरी नींद से जागा, तो उसने पाया कि उसने अपने जीवन में जो नकाब पहने थे, वे चोरी हो गए हैं। इस घटना के बाद वह समाज में 'पागल' के रूप में पहचानने लगा। इस अवस्था में उसे अपने असली स्वरूप की पहचान और स्वतंत्रता मिली। लेखक ने यह भी वर्णित किया है कि कैसे उसने कई बार ईश्वर से संवाद करने की कोशिश की, लेकिन हर बार उसे कोई उत्तर नहीं मिला। लेकिन जब उसने अपनी पहचान को समझा और ईश्वर के प्रति अपनी सच्ची भावना व्यक्त की, तो ईश्वर ने उसे अपनी ओर खींच लिया। इस अनुभव ने उसे यह सिखाया कि असली खुशी और पूर्णता अपने भीतर के सत्य को पहचानने में है। जिब्रान अपने दोस्तों के प्रति एक संदेश भी देते हैं कि वे जो दिखते हैं, वह उनकी असली पहचान नहीं है। वह कहते हैं कि उनके विचार और भावनाएं दूसरों से भिन्न हैं और उन्हें अपने भीतर के गहरे अनुभवों को अकेले ही जीने की आवश्यकता है। इस प्रकार, "पागल" केवल एक व्यक्तिगत अनुभव नहीं, बल्कि एक गहरा दार्शनिक और आध्यात्मिक संदेश है, जो आत्म पहचान, स्वतंत्रता और जीवन के वास्तविक अर्थ की खोज की बात करता है।
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