दृष्टान्त सागर | Drishtant Sagar

By: स्वामी अवधेशानंद जी - Swami Avdheshanand ji


दो शब्द :

इस पाठ में विभिन्न धार्मिक और नैतिक शिक्षाएँ प्रस्तुत की गई हैं, जिनमें भक्तों की भक्ति, गुरु की महत्ता और साधुओं के अनुभवों का उल्लेख है। पाठ का प्रारंभ एक बादशाह के शोक से होता है, जब उसके बेटे की मृत्यु हो जाती है। दुखी बादशाह अपने बेटे को जीवित करने के लिए फकीरों की मदद लेता है। फकीरों में से पहले सूरदास जी, फिर तुलसीदास जी और अंत में कबीरदास जी को बुलाया जाता है। सभी ने अपने-अपने तरीके से बादशाह को समझाया कि भक्त की भक्ति का महत्व है और भगवान भक्तों की कृपा से ही बड़े होते हैं। कबीरदास जी ने बादशाह को बताया कि भक्त का प्रताप भगवान से भी बड़ा होता है। पाठ में बताया गया है कि भक्ति और साधना का महत्व बहुत बड़ा है और भक्तों की याचना पर भगवान उनके भक्तों की सहायता करते हैं। इसके अलावा, यह भी बताया गया है कि धर्म का पालन करना और सही मार्ग पर चलना आवश्यक है। अंत में, पाठ में यह संदेश दिया गया है कि भक्ति और साधना के माध्यम से ही मनुष्य जीवन को सार्थक बना सकता है और मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। यह पाठ भक्तों की शक्ति, भक्ति के प्रताप और धर्म के पालन की आवश्यकता को उजागर करता है।


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