हिंदी काव्य -धारा | Hindi Kavya-Dhara

- श्रेणी: काव्य / Poetry हिंदी / Hindi
- लेखक: राहुल सांकृत्यायन - Rahul Sankrityayan
- पृष्ठ : 554
- साइज: 17 MB
- वर्ष: 1945
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दो शब्द :
पाठ में हिंदी काव्य-धारा, विशेषकर मध्यकालीन कवियों की काव्य परंपरा और उनके योगदान पर चर्चा की गई है। यह बताया गया है कि मध्यकालीन हिंदी कवियों ने संस्कृत के कवियों से संबंध स्थापित किया था, जिससे हिंदी साहित्य का विकास हुआ। इस युग में भाषा में बदलाव आया और यह प्राचीन लेखन से भिन्न हो गई। कवियों की भाषा में समय के साथ परिवर्तन होना स्वाभाविक है, और यह परिवर्तन पीढ़ी दर पीढ़ी देखने को मिलता है। कवियों की कृतियों का अध्ययन करते समय यह आवश्यक है कि उनकी भाषा की विशेषताओं को समझा जाए। इस युग में भाषा का विकास बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह न केवल हिंदी, बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्यिक विकास में भी योगदान देता है। अपभ्रश भाषा के संदर्भ में यह उल्लेख किया गया है कि इसे एक अलग भाषा समझना गलत है, क्योंकि यह हिंदी के निकटतम है। अपभ्रश में संस्कृत के शब्दों के साथ-साथ स्थानीय बोलचाल की भाषाओं का भी समावेश है। कवियों की भाषा विशेष रूप से उस समय की आम बोलचाल की भाषा पर आधारित थी, जो कि साहित्यिक कृतियों में भी परिलक्षित होती है। विभिन्न क्षेत्रों से आए कवियों ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया और उनकी रचनाओं में अलग-अलग भाषाई तत्व शामिल हैं। इस प्रकार, हिंदी काव्य-धारा में एक समृद्ध विविधता देखने को मिलती है, जिसमें विभिन्न बोलियों और भाषाओं का योगदान शामिल है। अंत में, यह बताया गया है कि हिंदी का विकास एक निरंतर प्रक्रिया है, जिसमें अन्य भाषाओं के साथ-साथ संस्कृत, प्राकृत, और अपभ्रश का भी योगदान है। हिंदी की पहचान और उसके साहित्यिक मूल्य को समझने के लिए यह ज़रूरी है कि हम इन सभी तत्वों पर ध्यान दें।
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