भारत का मुक्ति-संग्राम | Bharat Ka Mukti-Sangram

By: अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध - Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh


दो शब्द :

भारत का मुक्ति-संग्राम एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रक्रिया है, जिसमें अठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के दौरान विभिन्न विद्रोह और संघर्ष शामिल हैं। अंग्रेजों का भारत में अधिकार और लूट महत्वपूर्ण बिंदु है, जहां पुतंगाल, स्पेन और ब्रिटेन जैसे यूरोपीय देशों ने व्यापार के लिए भारत में प्रवेश किया और धीरे-धीरे यहां अपना साम्राज्य स्थापित किया। पुतंगालियों ने 1498 में कालीकट में व्यापारिक फैक्टरी स्थापित की, जिसके बाद अंग्रेजों और अन्य यूरोपीय देशों ने भी भारत में अपनी कंपनियों की स्थापना की। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का गठन 1600 में हुआ, और इसके बाद वे साम्राज्यवादी ताकत बन गए। उन्होंने भारत के स्थानीय राजाओं और नवाबों के साथ मिलकर व्यापार में एकाधिकार स्थापित किया। 1757 में प्लासी की लड़ाई में उन्होंने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हराकर भारत में अपना आधिपत्य स्थापित किया। इस दौरान भारत में विद्रोहों की एक श्रृंखला शुरू हुई, जैसे संत्यासी विद्रोह, मेदिनीपुर विद्रोह, और अन्य कई स्थानीय विद्रोह। ये विद्रोह अंग्रेजों के खिलाफ स्थानीय लोगों की असंतोष और संघर्ष को दर्शाते हैं। ये संघर्ष केवल साम्राज्यवादी लूट के खिलाफ नहीं थे, बल्कि भारतीय समाज के स्वाभाविक विकास को रोकने वाले विदेशी पूंजीवाद के खिलाफ भी थे। इस प्रकार, भारत का मुक्ति-संग्राम एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है, जिसमें विभिन्न वर्गों और समुदायों ने साम्राज्यवादी शासन के खिलाफ आवाज उठाई और स्वतंत्रता की दिशा में कदम बढ़ाए। यह संघर्ष भारत की स्वतंत्रता की दिशा में एक महत्वपूर्ण चरण था, जो अंततः 1947 में स्वतंत्रता की प्राप्ति में culminated हुआ।


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