युद्ध और शांति | Yudh Aur Shanti

By: गुरुदत्त - Gurudutt


दो शब्द :

इस पाठ में भारतीय समाज और उसके चार वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) के कार्यों, उनके अस्तित्व और उनके बीच के संबंधों पर चर्चा की गई है। लेखक ने बताया है कि यह विभाजन ईश्वरीय है और प्रत्येक वर्ण का अपना कार्य और जिम्मेदारी है। क्षत्रियों का कार्य शासन और रक्षा करना है, जबकि ब्राह्मणों का कार्य ज्ञान का प्रचार करना है। वर्तमान समय में, लेखक के अनुसार, ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ग केवल सेवक बनकर रह गए हैं और शूद्र तथा व्यापारी वर्ग का प्रभुत्व बढ़ गया है। पाठ में यह भी उल्लेख किया गया है कि भारतीय समाज में शिक्षा और अनुभवहीनता के कारण राजनीतिक निर्णय लेने वाले लोग अक्सर अपरिपक्व होते हैं। लेखक ने यह तर्क भी प्रस्तुत किया है कि युद्ध की स्थिति में क्षत्रिय वर्ग की विशेषता और ब्राह्मणों की शिक्षाप्रद भूमिका होती है, लेकिन शांति के समय में शूद्र और व्यापारी वर्ग उन पर हावी हो जाते हैं। लेखक ने ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह बताया है कि प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में जनसामान्य की भूमिका और उनके निर्णयों ने युद्ध की दिशा को प्रभावित किया। उन्होंने यह भी बताया कि युद्ध और शांति के बीच का संबंध जटिल है, क्योंकि शांति के समय में असुरक्षित प्रवृत्तियों के लोग अधिक सक्रिय हो जाते हैं। अंत में, पाठ में एक उपन्यास का उल्लेख है जिसमें पात्र काल्पनिक हैं, लेकिन कुछ ऐतिहासिक व्यक्तियों का भी संदर्भ दिया गया है। सारांश में, यह पाठ विचार करता है कि समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संतुलन और समन्वय आवश्यक है, ताकि शांति स्थापित की जा सके और युद्ध की आवश्यकता न पड़े।


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