ब्रह्मचर्य -दर्शन | Brahmacharya Darshan

By: पं. शोभाचंद्र जी भारिल्ल - Pt. Shobha Chandra JI Bharilla


दो शब्द :

इस पाठ में कवि श्री मुनि अमरचन्द्रजी महाराज द्वारा प्रस्तुत विचारों का संक्षेप में वर्णन किया गया है। यह 'सन्मति-साहित्य-रत्नमाला' की एक पुस्तक है, जिसमें मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है। इस पुस्तक में आत्म-शोधन, अंतर्विरोध, शक्ति का केंद्र, और ब्रह्मचर्य जैसे विषयों पर गहनता से विचार किया गया है। कवि ने मानव जीवन में अच्छाइयों और बुराइयों के संघर्ष को दर्शाया है। उन्होंने बताया है कि मानव जीवन में आध्यात्मिकता और दुर्वासनाओं का संग्राम चलता रहता है। इस संदर्भ में, जैन दर्शन का महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है, जो आत्मा की अशुद्धता और शुद्धता के कारणों का विश्लेषण करता है। कवि के अनुसार, आत्मा में दोनों, बुराइयाँ और अच्छाइयाँ विद्यमान हैं, लेकिन ये आत्मा के स्वभाव नहीं हैं। इसे समझने के लिए वस्त्र की निर्मलता और मलिनता का उदाहरण दिया गया है। जैसे वस्त्र की मलिनता बाहरी कारणों से होती है, वैसे ही आत्मा में विकार बाहरी होते हैं जबकि उसकी असली प्रकृति निर्मल होती है। इस प्रकार, पुस्तक आत्म-शोधन और जीवन की उच्चता की दिशा में प्रेरणा देती है, यह बताकर कि आत्मा को उसके स्वाभाविक रूप में लौटाना संभव है, जब हम सही साधना और प्रयास करें। इस पाठ का मुख्य उद्देश्य पाठकों को आत्मा की शुद्धता और उसके विकारों की पहचान कराना है, ताकि वे अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकें।


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