गिरती दीवारें | Girti Deewaren

- श्रेणी: नाटक/ Drama साहित्य / Literature
- लेखक: उपेन्द्रनाथ अश्क - Upendranath Ashk
- पृष्ठ : 581
- साइज: 68 MB
- वर्ष: 1967
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दो शब्द :
इस पाठ में उपेन्द्रनाथ अश्क द्वारा लिखित उपन्यास "गिरती दीवार" की चर्चा की गई है। प्रकाशक ने बताया है कि यह उपन्यास पिछले दस-बारह वर्षों में महत्वपूर्ण स्थान बना चुका है और इसके बारे में व्यापक चर्चा हुई है। विभिन्न आलोचकों ने उपन्यास की शक्तिमत्ता को स्वीकार किया है, जबकि कुछ ने इसे साधारण माना है। पाठक इसे पढ़कर अपने जीवन की घटनाओं से जुड़ाव महसूस करते हैं। लेखक ने इस संस्करण को संशोधित और परिष्कृत किया है, जिससे इसकी गुणवत्ता में सुधार हुआ है। पाठकों के लिए अतिरिक्त आलोचनाएँ और लेखक की दृष्टि भी शामिल की गई है, जिससे उपन्यास की उपादेयता बढ़ गई है। उपन्यास के पात्रों और घटनाओं का वर्णन ऐसा है कि पाठक को ऐसा लगता है जैसे वे अपनी ही ज़िंदगी की कहानियाँ पढ़ रहे हैं। अश्क ने इस उपन्यास की सफलता के बारे में अपने अनुभव साझा किए हैं, जिसमें उन्होंने बताया कि उन्होंने इसे लिखते समय संदेह किया था, लेकिन पाठकों का प्यार और स्वीकार्यता उन्हें प्रसन्न करती है। उन्होंने अपने पाठकों से प्राप्त पत्रों का भी जिक्र किया है, जहां पाठक ने उपन्यास को पढ़ने के बाद अपने अनुभव साझा किए हैं। इस पाठ में उपन्यास की आलोचना, लेखक की सोच और पाठकों के साथ उसके संबंध को दर्शाया गया है। उपन्यास की लोकप्रियता और प्रभाव को देखकर लेखक ने इसके दूसरे भाग की योजना बनाई है। अंत में, उपन्यास के संशोधित संस्करण का महत्व और उसकी गुणवत्ता में सुधार की दिशा में लेखक के प्रयासों को भी रेखांकित किया गया है।
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