हिन्दी गद्द -काव्य का उद्दव और विकास | Hindi Gadya-Kavya Ka Uddhav Aur Vikas

By: अष्टभुजाप्रसाद पाण्डेय - Ashtabhuja Pandey
हिन्दी गद्द -काव्य का उद्दव और विकास | Hindi Gadya-Kavya Ka Uddhav Aur Vikas by


दो शब्द :

हिन्दी गद्य-काव्य का उद्भव और विकास एक महत्वपूर्ण विषय है, जिसमें लेखक डा. ग्रष्टभुजाप्रसाद पाण्डे ने गद्य-काव्य के स्वरूप, उद्गम, विकास, भाव, रूप, शैली, कला और विशेषताओं पर चर्चा की है। उन्होंने बताया कि हिन्दी साहित्य में गद्य-काव्य पर विचार उतना विस्तृत नहीं था, जिसके कारण इस दिशा में अध्ययन की आवश्यकता महसूस हुई। लेखक ने उल्लेख किया कि गद्य-काव्य की परिभाषा और इसके विभिन्न तत्वों का अध्ययन किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि संस्कृत साहित्य के गद्य-काव्यों से हिन्दी गद्य-काव्य में भिन्नता है और इसका विकास अपने अनूठे स्वरूप में हुआ है। उन्होंने गद्य-काव्य के विभिन्न रूपों को नाटक, उपन्यास, कहानी, और निबंध से संबंधित किया और बताया कि गद्य-काव्य ने इन तत्वों को अपने में समाहित कर एक नया स्वरूप ग्रहण किया है। इसके साथ ही, उन्होंने गद्य-काव्य की रचनाएँ और उनके प्रभाव की भी चर्चा की। लेखक ने हिन्दी गद्य-काव्य के विकास में विभिन्न युगों के प्रभाव, विशेष रूप से आधुनिक काल में आए बदलावों पर ध्यान केंद्रित किया है। उन्होंने गद्य-काव्य के विशिष्ट तत्वों, भाव-सौंदर्य और कलागत महत्ता का भी विश्लेषण किया। अंत में, लेखक ने अपने प्रेरणास्त्रोतों का उल्लेख करते हुए यह प्रबन्ध प्रस्तुत किया है, जिसमें उन्होंने अनेक विद्वानों के योगदान को स्वीकार किया है और अपनी कृतियों की सराहना की है। इस प्रकार, यह प्रबन्ध गद्य-काव्य के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान है, जो इस विधा के स्वरूप और विकास को समझने में सहायक है।


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