अभिधनारजेन्द्र : | Abhidhana Rajendra:

By: विजया राजेंद्र सुरी - Vijayarajendra Suri


दो शब्द :

इस पाठ का सारांश कुछ इस प्रकार है: "अभिधानराजेन्द्र" एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है जो जैन धर्म, दर्शन और तात्त्विक विचारों पर आधारित है। इसमें शुद्ध ज्ञान और तात्त्विकता को समझाने का प्रयास किया गया है। ग्रंथ में विभिन्न विषयों पर चर्चा की गई है, जैसे कि जीव और निर्जीव के बीच का अंतर, कर्म का अर्थ, मोक्ष की प्राप्ति के साधन, और साधना के विभिन्न पहलू। जैन दर्शन में ज्ञान की प्राप्ति के लिए विभिन्न साधनों और विधियों का उल्लेख किया गया है। पाठ में यह भी बताया गया है कि कैसे व्यक्ति अपने कर्मों और विचारों के माध्यम से अपने जीवन को संवार सकता है। इसके अंतर्गत ध्यान, साधना, और नैतिकता पर जोर दिया गया है। ग्रंथ में धार्मिक और दार्शनिक विचारों का समावेश है, जो जैन परंपरा और ग्रंथों की गहराई को दर्शाता है। इसे जैन उपदेशों और सिद्धांतों का संग्रह भी माना जा सकता है, जो अनुयायियों के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है। इस प्रकार, "अभिधानराजेन्द्र" जैन धर्म के लिए एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जो न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि तात्त्विक और दार्शनिक दृष्टि से भी गहराई लिए हुए है।


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