क़ुरान पारा- ६ | Quraan para - 6

- श्रेणी: Islamic | इस्लामी उर्दू / Urdu
- लेखक: अज्ञात - Unknown
- पृष्ठ : 30
- साइज: 18 MB
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दो शब्द :
इस पाठ में अल्लाह के आदेशों, ईमान की महत्वता, और यहूदियों तथा ईसाईयों के साथ संबंधों पर ध्यान दिया गया है। अल्लाह ने स्पष्ट किया है कि वह किसी की बुरी बात को सार्वजनिक रूप से कहने को पसंद नहीं करता, सिवाय इसके कि जिस पर जुल्म हुआ हो, उसे अपनी बात कहने की अनुमति है। अल्लाह ने यह भी बताया है कि अगर कोई भलाई की बात छुपाए या बुराई से दरगुजर करे, तो वह बख्शने वाला है। इसमें उन लोगों की चर्चा की गई है जो अल्लाह और उसके रसूलों के साथ कुफ्र करते हैं और ईमान लाने में भेदभाव करते हैं। ऐसे लोग वास्तव में काफिर हैं और उनके लिए दर्दनाक सजा तैयार की गई है। इसके विपरीत, जो लोग ईमान लाते हैं और अच्छे कार्य करते हैं, उन्हें अल्लाह अनुग्रह प्रदान करेगा। यहूदियों और ईसाईयों के बारे में कहा गया है कि उन्होंने कई बार अल्लाह के आदेशों का पालन नहीं किया और नबी को झूठा ठहराया। अल्लाह ने उन्हें कई बार सजाएं दी हैं, लेकिन फिर भी वे अपनी गलतियों से नहीं सीखे। इस पाठ में यह भी बताया गया है कि मसीह (ईसा) अल्लाह का रसूल हैं और उन्हें अल्लाह का बेटा मानना गलत है। पाठ में यह भी कहा गया है कि मुसलमानों को यहूदियों और ईसाईयों के साथ दोस्ती करने से बचना चाहिए क्योंकि उनका विश्वास और आचार सही नहीं है। ईमानवालों को एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए और अल्लाह से डरते रहना चाहिए। अंत में, यह पाठ अल्लाह की किताबों पर ईमान लाने, उनके आदेशों का पालन करने, और दूसरों के गलत आचरण से दूर रहने की आवश्यकता पर बल देता है।
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