उल्टा दांव | Ulta Daav

- श्रेणी: कहानियाँ / Stories
- लेखक: प्रबोध कुमार सान्याल - Prabodh Kumar sanyal
- पृष्ठ : 153
- साइज: 6 MB
- वर्ष: 1900
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दो शब्द :
एक समय था जब नई बहू के साथ मायके से कोई नौकरानी या दासी भेजी जाती थी ताकि वह ससुराल के नए माहौल में सहज महसूस कर सके। ससुराल की परंपराओं और रिश्तों में धीरे-धीरे वह नई बहू अपने आपको ढाल लेती थी। लेकिन अब समय बदल गया है। अब नई बहू अपने साथ केवल अपनी मुस्कान लेकर आती है और परिवार में नए जीवन का संचार करती है। हेमन्त की पत्नी शिवानी न केवल खूबसूरत थी, बल्कि शिक्षित भी थी। यह जोड़ी एक आधुनिक परिवार की नई पहचान बन गई। माया देवी, जो कि हेमन्त की माँ हैं, अपने घर को सही से संभालने का प्रयास कर रही थीं, और उन्हें उम्मीद थी कि हेमन्त जल्द ही लौटेंगे। माया देवी का सपना था कि उनका बेटा और बहू शादी के बाद इस घर में खुश रहें। एक दिन माया देवी और शिवानी के बीच बातचीत होती है, जिसमें माया देवी अपने अतीत की यादें ताजा करती हैं। वह बताती हैं कि कैसे उन्होंने अपने पति के लिए कई बार कोशिश की, ताकि उनका बेटा एक अच्छी बहू से शादी कर सके। शिवानी माया देवी के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त करती हैं और यह भी बताती हैं कि घर में काम करने वाले लोगों की संख्या अधिक है, जिससे कुछ परेशानी होती है। माया देवी को यह समझ में आता है कि शिवानी की दृष्टि सही है और वह सोचने लगती हैं कि क्या इतनी संख्या में लोगों को रखने का कोई फायदा है। शिवानी यह सुझाव देती हैं कि कुछ लोग घर में रहने की आवश्यकता नहीं हैं। माया देवी इस पर विचार करती हैं, लेकिन साथ ही यह भी महसूस करती हैं कि घर का काम सही ढंग से चलाना जरूरी है। कहानी में परिवार के रिश्तों, आधुनिकता और पारंपरिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की जा रही है। यह एक नई बहू के ससुराल में आने के साथ शुरू होने वाले जीवन की कहानी है, जहां वह अपने नए परिवेश में खुद को ढालने की कोशिश कर रही है।
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