भूख | Bhookh by


दो शब्द :

इस पाठ में भारत के इतिहास में हुए भीषण अकाल और इसके प्रभावों पर चर्चा की गई है। लेखिका ने 1866-67 के राजस्थान के अकाल से शुरू होकर 1943 के बंगाल के अकाल तक के समय पर ध्यान केंद्रित किया है। उन्होंने वर्णन किया है कि कैसे इन अकालों ने समाज को प्रभावित किया और लोगों की मानसिकता तथा सामाजिक स्थिति को बदला। लेख में बताया गया है कि भूख और दरिद्रता ने लोगों को मजबूर किया, जिससे कई ने अपनी नैतिकता खो दी। व्यापारियों ने चावल का संग्रह करना शुरू कर दिया, जबकि गरीब मजदूरों को रोज़ी-रोटी के लिए भीख मांगने पर मजबूर होना पड़ा। इस पृष्ठभूमि में, लेखक ने व्यक्तिगत अनुभव साझा किए हैं, जिसमें उन्होंने भूख और अकाल के प्रभावों को देखा और महसूस किया। इस दौरान, उन्होंने कुछ विशेष पात्रों को भी चित्रित किया, जैसे कि पाचू, जो एक स्कूल के हेडमास्टर हैं। उनका अनुभव और विचार इस स्थिति को समझने में मदद करते हैं। पाचू की कहानी में उनके शिष्य गणेश की भूख से मृत्यु और इसके बाद की उनकी मानसिक स्थिति का वर्णन है, जो उन्हें अपने कर्तव्यों और समाज की स्थिति पर विचार करने के लिए मजबूर करता है। कुल मिलाकर, यह पाठ एक गहन और करुणामय दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जो अकाल के समय मानवता की भीषणता और संघर्ष को उजागर करता है।


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