श्रीनगर - रास - सागर | Shrinagar Ras Sagar

- श्रेणी: काव्य / Poetry साहित्य / Literature
- लेखक: श्री राधावल्लभ जी - Shri Radha Vallabh Ji
- पृष्ठ : 1309
- साइज: 93 MB
- वर्ष: 1956
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दो शब्द :
इस पाठ में ब्रज-साहित्य और विशेष रूप से श्री वृंदावन के भक्तिकाव्य की महत्ता का वर्णन किया गया है। पाठ में बताया गया है कि ब्रज के देवालयों, विशेषकर वृंदावन के मंदिरों में गाए जाने वाले भक्तिपदों का समाज में महत्वपूर्ण स्थान है। ये पद विभिन्न ऋतुओं और उत्सवों को दर्शाते हैं, जिनमें श्री कृष्ण और राधा के प्रेम और लीला का वर्णन किया गया है। भक्ति कवियों की रचनाएँ केवल धार्मिक भावनाओं को व्यक्त नहीं करतीं, बल्कि उनमें रसिक भावनाएं भी समाहित हैं। ये पद काव्य की सुन्दरता के साथ-साथ भक्तों के हृदय की गहराईयों को भी छूते हैं। पाठ में यह भी बताया गया है कि विभिन्न भक्त समूहों की परंपराएँ और भिन्न रीतियाँ हैं, फिर भी सभी का उद्देश्य एक ही है—राधा-कृष्ण की भक्ति का प्रचार करना। पाठ में भक्तिपदों की सांगीतिकता और उनकी सामूहिक प्रस्तुति का महत्व भी उजागर किया गया है। यहां यह सुझाव दिया गया है कि पाठक इन पदों का आनंद लें, ताकि वे भक्ति के अनुभव को और गहराई से समझ सकें। अंत में, विभिन्न भक्त कवियों और उनके योगदान का उल्लेख करते हुए, ब्रज की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
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