भारतीय दर्शन की रुपरेखा | Bharatiya Darshan Ki Rooprekha

By: गोवर्धन भट्ट - Govardhan Bhatt श्रीमती मंजु गुप्त - Shrimati Manju Gupta


दो शब्द :

यह ग्रंथ भारतीय दर्शन पर आधारित व्याख्यानों का संग्रह है, जिसे लेखक एम्. हिरियन्ता ने मैसूर विश्वविद्यालय में कई वर्षों तक पढ़ाया। इसका उद्देश्य इसे उन कॉलेजों में एक पाठ्यपुस्तक के रूप में प्रस्तुत करना है, जहां भारतीय दर्शन पढ़ाया जाता है। इसे मुख्य रूप से विद्यार्थियों के लिए लिखा गया है, लेकिन इसे उन लोगों के लिए भी उपयोगी माना जाता है जो भारतीय विचारकों द्वारा प्रस्तुत दार्शनिक समस्याओं में रुचि रखते हैं। इस पुस्तक में भारतीय दर्शन के विभिन्न पहलुओं का समग्र विवरण दिया गया है। इसमें भारतीय विचारधारा की प्रमुख विशेषताओं को संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है और फिर इसे तीन भागों में विभाजित किया गया है: (1) वैदिक युग, (2) प्रारम्भिक वेदोत्तर युग, और (3) दर्शनों का युग। प्रत्येक भाग में संबंधित युग के सिद्धांतों का वर्णन किया गया है, जिसमें ऐतिहासिक सर्वेक्षण और व्यावहारिक शिक्षा का भी समावेश है। लेखक ने हाल में प्रकाशित भारतीय दर्शन पर आधारित पुस्तकों का उपयोग किया है, लेकिन अधिकांश विचार मूल ग्रंथों के स्वतंत्र अध्ययन पर आधारित हैं। उन्होंने संस्कृत शब्दों का प्रयोग न्यूनतम रखा है ताकि पाठकों को पढ़ने में कठिनाई न हो। पुस्तक में बौद्ध धर्म के माध्यमिक सम्प्रदाय पर चर्चा की गई है और वेदान्त दर्शन के द्वैत सम्प्रदाय का भी उल्लेख किया गया है। इस ग्रंथ के लिखने में लेखक ने आंध्र विश्वविद्यालय के उपकुलपति सर एस. राघाकृष्णन और श्री डी. वंकटरमैया का आभार व्यक्त किया है, जिन्होंने उनके काम में सहायता की और सुझाव दिए। समग्र में, यह पुस्तक भारतीय दर्शन की गहरी समझ प्रदान करती है और इसे अध्ययन के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।


Please share your views, complaints, requests, or suggestions in the comment box below.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *