ब्रह्मचर्य ही जीवन है और वीर्य्यनाश ही मृत्यु है | Brahmacharya Hi Jeevan Hai aur Veeryanash Hi Mrityu Hai

- श्रेणी: Vedanta and Spirituality | वेदांत और आध्यात्मिकता दार्शनिक, तत्त्वज्ञान और नीति | Philosophy
- लेखक: स्वामी शिवानन्द - Swami Shivanand
- पृष्ठ : 198
- साइज: 5 MB
- वर्ष: 1929
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दो शब्द :
यह पाठ "ब्रह्मचर्य" के महत्व और उसके संरक्षण के विषय में है। लेखक स्वामी शिवानंद ने इस ग्रंथ में ब्रह्मचर्य को जीवन का आधार और वीर्य के नाश को मृत्यु के समान बताया है। उनका मानना है कि आज के युवाओं में ब्रह्मचर्य का पतन हो रहा है, जिसके कारण वे जल्दी बूढ़े और कमजोर होते जा रहे हैं। स्वामी जी ने बताया है कि शिक्षा प्रणाली में ब्रह्मचर्य जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा नहीं की जाती, जिससे युवा गलत मार्ग पर जा रहे हैं। उन्होंने माता-पिता और शिक्षकों से आग्रह किया है कि वे बच्चों को सही दिशा में मार्गदर्शन करें, ताकि वे स्वस्थ, साहसी और देशभक्त बन सकें। लेखक ने अपने अनुभव और अध्ययन के आधार पर यह पुस्तक लिखी है, जिसमें उन्होंने ब्रह्मचर्य के लाभ और पालन के सरल नियम बताए हैं। उनका कहना है कि यदि युवा इन नियमों का पालन करें, तो उनका जीवन बदल सकता है और वे आत्मनिर्भर तथा शक्तिशाली बन सकते हैं। स्वामी शिवानंद ने इस ग्रंथ को अपने गुरु और समाज के प्रति श्रद्धांजलि के रूप में प्रस्तुत किया है। उन्होंने पाठकों से अपील की है कि वे इस पुस्तक को पढ़ें और अपने जीवन में लागू करें, जिससे समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सके।
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