सकारात्मक सोच की कला | Skaratmk Soch ki Kala

- श्रेणी: Vedanta and Spirituality | वेदांत और आध्यात्मिकता ज्ञान विधा / gyan vidhya योग / Yoga
- लेखक: स्वामी ज्योतिर्मयानंद - Swami Jyotirmyanand
- पृष्ठ : 99
- साइज: 10 MB
- वर्ष: 1998
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दो शब्द :
इस पाठ का सारांश निम्नलिखित है: पुस्तक "सकारात्मक सोच की कला" में लेखक स्वामी ज्योतिर्मयानन्द ने सकारात्मक सोच की शक्ति और उसके प्रभावों पर प्रकाश डाला है। लेखक का मानना है कि विचारों की शक्ति से व्यक्ति अपने भाग्य का निर्माण कर सकता है। सकारात्मक विचार न केवल व्यक्तिगत विकास को प्रेरित करते हैं, बल्कि समाज में भी सकारात्मक बदलाव लाने में सहायक होते हैं। लेखक का यह भी कहना है कि नकारात्मक विचारों से व्यक्ति असफल होता है और समाज में बुराइयाँ फैलती हैं। लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि सकारात्मक सोच का विकास कैसे किया जा सकता है, और इसके लिए मानसिकता को ईर्ष्या, क्रोध, और लोभ जैसी नकारात्मक भावनाओं से मुक्त रखना आवश्यक है। इसके अलावा, विचारों का हमारे स्वास्थ्य पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है, जिससे यह सिद्ध होता है कि सकारात्मक विचारों से शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है, जबकि नकारात्मक विचार तनाव और बीमारियों का कारण बनते हैं। स्वामी ज्योतिर्मयानन्द ने अपने अनुभवों के माध्यम से यह बताया है कि सकारात्मक सोच और सृजनात्मक क्रियाएँ एक साथ चलनी चाहिए। केवल सकारात्मक विचारों से सफलता नहीं मिलती, बल्कि उन विचारों को क्रियान्वित करने की आवश्यकता होती है। इसलिए, मन को सदैव सकारात्मक बनाए रखना और उसे सृजनात्मक कार्यों में लगाना आवश्यक है। इस प्रकार, यह पुस्तक पाठकों को उनके जीवन में सकारात्मकता, सफलता, और आध्यात्मिक प्रबुद्धता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है।
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