श्रीमद भगवद गीता | Shreemad Bhgwad Geeta

- श्रेणी: धार्मिक / Religious साहित्य / Literature हिंदू - Hinduism
- लेखक: महर्षि वेद व्यास - Mahrshi Ved Vyas
- पृष्ठ : 285
- साइज: 18 MB
- वर्ष: 1946
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दो शब्द :
पाठ का सारांश इस प्रकार है: यह पाठ 'भगवद गीता' के महत्व और उसके पहले अध्याय का वर्णन करता है। गीता का उपदेश भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्ध भूमि में अर्जुन को दिया था। यह ग्रंथ वेदों और उपनिषदों का सार है और हिंदू धर्म में इसका विशेष स्थान है। कुरुक्षेत्र में जब युद्ध के लिए सेनाएँ एकत्रित होती हैं, तब धृतराष्ट्र अपने चाटुकार संजय से पूछते हैं कि पांडवों और कुरुवंश के योद्धाओं ने क्या किया। संजय बताता है कि दुर्योधन ने पांडवों की शक्ति और व्यूह को देखकर द्रोणाचार्य के पास जाकर उनकी सहायता मांगी। वह पांडवों की सेना की शक्ति का बखान करता है और भीष्म पितामह से सुरक्षा की बात करता है। इसके बाद, युद्ध की तैयारियों के दौरान शंखनाद होता है। अर्जुन अपने रथ पर बैठकर युद्धभूमि को देखता है और अपने परिवार के सदस्यों, गुरु, और मित्रों को देखकर करुणा से भर जाता है। वह युद्ध में अपने स्वजन के खिलाफ खड़े होने के विचार से दुखी होता है और उसकी मनोदशा में असमंजस उत्पन्न होता है। अंत में, वह अपने धनुष को छोड़कर रथ के पीछे बैठ जाता है, यह दर्शाते हुए कि वह युद्ध करने में असमर्थ है। इस प्रकार, पाठ यह दर्शाता है कि अर्जुन के भीतर युद्ध के प्रति अनिच्छा और करुणा का संघर्ष उत्पन्न होता है, जो गीता के शिक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि तैयार करता है।
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