मुद्रा शास्त्र | Mudra Shastra

By: प्राण नाथ विज्यालंकार - Pran Nath Vidhyalankar
मुद्रा शास्त्र | Mudra Shastra by


दो शब्द :

इस पाठ का परिचय जयपुर राज्य के खेतड़ी राज्य के राना श्रीअनीतसिंह के बारे में है, जो एक यशस्वी और विद्या प्रेमी व्यक्ति थे। उन्होंने गणित और विज्ञान में गहरी रुचि रखी और स्वामी विवेकानंद के साथ कई बार संवाद किया। रानी आउश्रा से उनकी तीन संताने थीं, जिनमें से एक पुत्र और दो पुत्रियाँ थीं। सभी संतानों के जीवन में दुःखद घटनाएँ हुईं, जिनमें से नयसिंहजी का स्वर्गवास मात्र 17 वर्ष की आयु में हुआ, जिससे परिवार और प्रजा को गहरा आघात लगा। श्रीमती सूर्यकुमारी, रानी आउश्रा की एक संतति, शिक्षित और साहित्य प्रेमी थीं। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद करने की इच्छा व्यक्त की थी। उनके निधन के बाद, उनके पुत्र राजकुमार श्रीव्मेदरसिह ने उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए एक लाख रुपये का दान दिया, जिससे हिंदी साहित्य के विकास के लिए एक अक्षय नीवी की स्थापना की गई। पुस्तक में मुद्रा के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है, जैसे मुद्रा का स्वरूप, उसका महत्व, विकास, व्यवहार, मूल्य और विभिन्न आर्थिक सिद्धांत। मुद्रा को व्यक्ति और समाज के जीवन में महत्वपूर्ण माना गया है और यह बताया गया है कि वस्तुओं के आदान-प्रदान की प्रणाली का समाज की उन्नति पर गहरा प्रभाव है। मुद्रा की प्रणाली, उसके विकास और विनिमय के सिद्धांतों की व्याख्या करते हुए यह बताया गया है कि समाज की आर्थिक स्थिति और सभ्यता का आकलन मुद्रा के स्वरूप से किया जा सकता है। इसके अलावा, श्रम-विभाग और मुद्रा-प्रणाली के बीच के संबंध को भी स्पष्ट किया गया है, यह बताते हुए कि मुद्रा के अभाव में सामाजिक और राजनीतिक संरचनाएँ प्रभावित होती हैं।


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