भवरोग की रामबाण दवा | Bhav Rog ki Ramban Dava

By: हनुमान प्रसाद पोद्दार - Hanuman Prasad Poddar
भवरोग की रामबाण दवा | Bhav Rog ki Ramban Dava by


दो शब्द :

इस पाठ में "भवरोग की रामबाण दवा" पर चर्चा की गई है, जिसमें मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक गुणों का निरूपण किया गया है। लेखक ने सहिष्णुता, सेवा, सम्मानदान, स्वार्थत्याग, और समता जैसे पांच महत्वपूर्ण गुणों को 'पश्चसकार' नामक नुस्खे के रूप में प्रस्तुत किया है। सहिष्णुता के अंतर्गत चार प्रकार की सहिष्णुता का वर्णन किया गया है: इन्द्रसहिष्णुता, वेगसहिष्णुता, परोत्कर्षसहिष्णुता, और पर-मत सहिष्णुता। इन्द्रसहिष्णुता का अर्थ है जीवन में आने वाले सुख-दुख, मान-अपमान, और अन्य विरोधाभासों को बिना प्रभावित हुए सहन करना। लेखक ने इस गुण की महत्ता को दर्शाते हुए बताया कि यह मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। पाठ में यह भी बताया गया है कि सहिष्णुता की प्राप्ति के लिए कुछ विचारों पर ध्यान देना आवश्यक है, जैसे कि सभी घटनाएँ हमारे पूर्वकृत कर्मों का फल हैं और हमें इन्हें सहन करना होगा। इसके अलावा, सुख और दुख का अनुभव हमारे मन से जुड़ा हुआ है, और इस ज्ञान से हम अज्ञान और राग-द्वेष को समाप्त कर सकते हैं। लेखक ने यह भी स्पष्ट किया है कि भगवान की लीला को समझ कर, हमें उनके द्वारा निर्धारित हर स्थिति को सम्मानपूर्वक स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि वे हमारे परम मित्र और कल्याणकारी हैं। इस प्रकार, सहिष्णुता को आत्मसात करने से हम मानसिक विकारों से मुक्ति पा सकते हैं और आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर हो सकते हैं। कुल मिलाकर, यह पाठ जीवन में सकारात्मक गुणों को अपनाने और मानसिक स्वास्थ के लिए आवश्यक उपायों को प्रस्तुत करता है।


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