योग प्रयोग आयोग | yog Prayog Aayog

- श्रेणी: योग / Yoga साहित्य / Literature
- लेखक: डॉ. साध्वी मुक्तिप्रभा - Dr. Sadhvi Muktiprabha
- पृष्ठ : 316
- साइज: 11 MB
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दो शब्द :
यह पाठ एक योग-साधना विषयक ग्रंथ का सारांश है, जिसमें साध्वी मुक्ति प्रभा द्वारा जैन दर्शन में योग के महत्व और विवेचन का वर्णन किया गया है। योग का अर्थ केवल शारीरिक क्रियाओं से नहीं, बल्कि आत्मा के उत्कर्ष और परम ध्येय की प्राप्ति से भी जुड़ा हुआ है। जैन दर्शन में योग को कर्मों से आत्मा के बंधन के रूप में समझा जाता है, जिससे यह भ्रांति उत्पन्न होती है कि जैनों का योग से विरोध है, जबकि वास्तव में जैन दर्शन साधना का एक गहन और समृद्ध क्षेत्र है। लेख में यह बताया गया है कि योग का सही अर्थ आत्मा का विकास करना है। योग शब्द की व्याख्या विभिन्न विद्वानों द्वारा की गई है, जिसमें आचार्य पतंजलि का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने योग को चित्तवृत्तियों के निरोध के रूप में परिभाषित किया है और इसे साधना की एक विशेष प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया है। पाठ में यह भी बताया गया है कि योग की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है और विभिन्न ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। विशेष रूप से भारतीय संस्कृति में योग का स्थान अत्यधिक महत्वपूर्ण है, जो मानव जीवन को पूर्ण विकसित करता है। आत्मा का विकास योग के माध्यम से ही संभव है, जिससे मन की विकृतियाँ समाप्त होती हैं और आत्मा की ज्योति प्रकट होती है। पाठ में जैन आगम साहित्य के संदर्भ में भी योग के अर्थ और उसकी साधना पर चर्चा की गई है। यहाँ हठयोग को प्राथमिकता नहीं दी गई है, बल्कि ध्यान और तप पर जोर दिया गया है। जैन परंपरा में ध्यान की गहराई और अनुभव को समझने के लिए विभिन्न आचार्यों द्वारा अनेक ग्रंथ रचे गए हैं, जो जैन योग पद्धति का विश्लेषण करते हैं। अंततः, योग का सही अर्थ, उसकी परंपरा और साधना की प्रक्रिया को समझने के लिए पाठ में विभिन्न दृष्टिकोणों और विश्लेषणों का समावेश किया गया है, जिससे पाठक को योग के वास्तविक स्वरूप को समझने में सहायता मिलती है।
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