ऋग्वैदिक आर्य | Rigvedic Arya

By: राहुल सांकृत्यायन - Rahul Sankrityayan
ऋग्वैदिक आर्य | Rigvedic Arya by


दो शब्द :

इस पाठ में ऋग्वेदिक आर्य संस्कृति और इतिहास का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। लेखक राहुल सांकृत्यायन ने इस पुस्तक को लिखने की प्रेरणा तब ली जब उन्हें ऋग्वेद से संबंधित किसी पुस्तक की अनुपलब्धता का सामना करना पड़ा। वेदों को सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से मूल्यवान मानते हुए, उन्होंने इस विषय पर अपना शोध प्रस्तुत किया है। लेखक ने स्पष्ट किया है कि ऋग्वेद का काल और इसके आर्य जनों की संस्कृति का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऋग्वेदिक आर्य केवल भारत में ही नहीं, बल्कि ईरान और अन्य क्षेत्रों में भी अपनी उपस्थिति रखते थे। ईरानी संस्कृति और वेदों के बीच काफी समानताएं पाई जाती हैं, जो इस बात को दर्शाती हैं कि इनका विकास एक समान परंपरा से हुआ था। इसी प्रकार, लेखक ने यह भी बताया है कि ऋग्वेदिक आर्यों की कृषि और पशुपालन की संस्कृति थी, जिसमें पशुधन को सबसे बड़ा धन माना जाता था। उन्होंने यह भी उल्लेख किया है कि भारतीय सभ्यता की नींव में ऋग्वेद का बड़ा योगदान है, और इसकी सांस्कृतिक धरोहर को समझने के लिए सिन्धु-उपत्यका की संस्कृति का अध्ययन भी आवश्यक है। पाठ में यह बात भी उठाई गई है कि ऋग्वेदिक काल में नागरिक संस्कृति के अवशेष मिलते हैं, जो उन आर्य जनों की जीवनशैली को समझने में मदद करते हैं। लेखक ने यह भी उल्लेख किया है कि ऋग्वेद के अध्ययन में सावधानी बरतने की आवश्यकता है, क्योंकि बाद की रचनाओं में ऐतिहासिक तथ्यों को गड़बड़ाने की प्रवृत्ति देखी गई है। अंत में, लेखक ने दर्शाया है कि ऋग्वेदिक आर्य संस्कृति का अध्ययन न केवल भारतीय इतिहास के लिए, बल्कि विश्व इतिहास के लिए भी महत्वपूर्ण है।


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