वैदिक काल का इतिहास | Vaidik Kal ka Itihas

- श्रेणी: इतिहास / History वैदिक काल / vedik period साहित्य / Literature
- लेखक: आर्य्यमुनिजी - Aaryyamuniji
- पृष्ठ : 174
- साइज: 36 MB
- वर्ष: 1925
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दो शब्द :
इस पाठ का सारांश यह है कि वैदिक काल में भारत एक समृद्ध और संगठित समाज था, जिसमें ऋषि-मुनियों और महात्माओं का महत्वपूर्ण स्थान था। इस काल में सभी लोग एकता में बंधे हुए थे और वेदों तथा अन्य शास्त्रों का पालन करते थे। समाज में मित्रता और सहयोग की भावना प्रबल थी, जिससे सभी एक-दूसरे के कल्याण की सोचते थे। इस समय छुआछूत का कोई प्रचलन नहीं था और सभी जातियों के लोग एक साथ मिलकर उत्सव मनाते थे। पाठ में यह भी वर्णन किया गया है कि उस समय शिक्षा का स्तर बहुत ऊँचा था और लोग विभिन्न कलाओं और विद्या में निपुण थे। वैदिक समाज में युद्ध कौशल भी विकसित था, जहाँ लोग शस्त्रों और अस्त्रों के निर्माण में दक्ष थे। रामायण और महाभारत के काल में धनुर्विद्या का विशेष विकास हुआ, जिसमें राम ने एक साथ कई राक्षसों का संहार किया। इसके अलावा, पाठ में यह संकेत दिया गया है कि समय के साथ सभाओं और समाज की स्थिति में परिवर्तन आया है। प्राचीन सभाओं में विद्वान और अनुष्ठान सम्पन्न लोग ही वक्ता होते थे, जबकि वर्तमान में वक्ता और श्रोताओं के बीच एकता की कमी है। इस कारण समाज अपने लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर पा रहा है। अंत में, पाठ में यह बताया गया है कि वैदिक काल की विशेषताएं और उसका अनुकरण आज के समाज के लिए आवश्यक हैं ताकि हम अपने कल्याण की दिशा में आगे बढ़ सकें।
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