वैदिक वांग्मय का इतिहास प्रथम भाग | Vaidik Vangmay ka Itihas part 1

- श्रेणी: इतिहास / History वैदिक काल / vedik period
- लेखक: पं. भगवद्दत्त - Pt. Bhagavadatta
- पृष्ठ : 320
- साइज: 73 MB
- वर्ष: 1935
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दो शब्द :
लेखक का जन्म 1893 में अमृतसर में हुआ था। उन्होंने 1913 में बी.ए. के बाद संस्कृत का अध्ययन करना शुरू किया और 1915 में बी.ए. पास किया। उनके जीवन में स्वामी रुक्ष्मणानन्द जी का गहरा प्रभाव रहा, जिन्होंने उन्हें वेदाध्ययन का मार्ग दिखाया। वे 1912 में स्वामी जी के निधन के बाद भी उनके उपदेशों को अपने जीवन में अपनाते रहे। लेखक ने 1916 से 1921 तक दयानन्द कॉलेज लाहौर में काम किया और 1934 तक वहां के अनुसन्धान विभाग के अध्यक्ष बने। इस दौरान उन्होंने 7000 हस्तलिखित ग्रंथ एकत्रित किए, जो अन्यत्र अनुपलब्ध थे। वेदिक और संस्कृत साहित्य का अध्ययन उनके जीवन का उद्देश्य बन गया। 1933 में कालेज के कुछ प्रबंधकों ने वेदाध्यन करने वालों को अपने नौकर समझा, जिससे लेखक को गहरा आघात लगा। उन्होंने महात्मा हंसराज जी के निर्णय पर कालेज छोड़ने का संकल्प किया और 1934 में कालेज त्याग दिया। लेखक ने अपने जीवन को वेदिक वाडिमय के अर्पण कर दिया है और उन्होंने पजाब यूनिवर्सिटी के पुस्तकालय से लाभ उठाया। वेदिक साहित्य के इतिहास पर उन्होंने कई ग्रंथ प्रकाशित किए हैं और आगे भी इस दिशा में कार्य करते रहने का संकल्प लिया है। उन्होंने अपने ग्रंथों के लिए सहयोगियों और मित्रों का आभार व्यक्त किया और भविष्य में अधिक शोध और सम्पादन करने की इच्छा जताई। लेखक ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत में वैदिक ग्रंथों के प्रति विद्वानों का ध्यान बहुत कम है और वे इस दिशा में अपने प्रयास जारी रखेंगे।
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