जैन योग सिद्धांत और साधना | Jain Yog Sidhant aur Sadhana

- श्रेणी: धार्मिक / Religious योग / Yoga हिंदू - Hinduism
- लेखक: अमर मुनि - Amar Muni आत्माराम जी महाराज - Aatmaram Ji Maharaj डॉ. ब्रिजमोहन जैन - Dr. Brijmohan Jain श्रीचन्द सुराना 'सरस' - Shreechand Surana 'Saras'
- पृष्ठ : 508
- साइज: 20 MB
- वर्ष: 1983
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दो शब्द :
इस पाठ में आचार्य श्री आत्माराम जी महाराज के योगदान और जैन योग के सिद्धांत तथा साधना पर चर्चा की गई है। इसमें योग को चित्तवृत्तियों के निरोध के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसमें चित्त की विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन किया गया है। चित्त की अवस्थाओं में 'क्षिप्त', 'मूढ', 'विक्षिप्त', 'एकाग्र', और 'निरुद्ध' शामिल हैं। इनमें से पहले दो अवस्थाएँ समाधि के लिए अनुपयुक्त मानी गई हैं, जबकि अंतिम दो अवस्थाएँ - एकाग्र और निरुद्ध - ही समाधि की प्राप्ति के लिए उपयुक्त हैं। पाठ में यह भी बताया गया है कि योग का उद्देश्य मानसिक क्लेशों का नाश करना है और साधक को आत्मज्ञान की ओर ले जाना है। योग की विभिन्न अवस्थाओं की व्याख्या करते हुए 'सप्रज्ञात' और 'असप्रज्ञात' समाधि के भेद को स्पष्ट किया गया है। इस प्रकार, योग के माध्यम से आत्मा की शुद्धि और कैवल्य की प्राप्ति को एक महत्वपूर्ण लक्ष्य माना गया है। अंत में, यह बताया गया है कि जैन धर्म में श्रत-धर्म और चारित्र-धर्म के माध्यम से तत्त्वज्ञान और सम्यक् आचरण से योग की सिद्धि होती है।
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