कंकाल | Kankaal by


दो शब्द :

इस पाठ में जयशंकर प्रसाद के जीवन और साहित्यिक यात्रा का विवरण दिया गया है। उनका जन्म एक भक्तिप्रधान परिवार में हुआ और उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा अपने घर पर ही प्राप्त की। किशोरावस्था में उनकी काव्य प्रतिभा विकसित हुई। वे विभिन्न साहित्यिक विधाओं में लेखन करने लगे और उनके काव्य, निबंध, और उपन्यास हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण माने जाते हैं। पाठ का एक हिस्सा "कंकाल" उपन्यास का पहले खंड का परिचय देता है, जिसमें माघ की अमावस्या के अवसर पर प्रयाग में आयोजित एक मेले का दृश्य प्रस्तुत किया गया है। मेले में भीड़-भाड़ और साधुओं की हलचल के बीच एक महात्मा का वर्णन किया गया है, जो तपस्वी और प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी हैं। पाठ में दर्शाया गया है कि कैसे एक युवक और उसकी पत्नी, जो साधु के दर्शन के लिए आए हैं, उसके प्रति श्रद्धा और जिज्ञासा प्रकट करते हैं। महात्मा की उपस्थिति और उनके ज्ञान की चर्चा से पाठ में एक आध्यात्मिक गहराई भी है। महात्मा ने एक उपदेश दिया, जिसमें बताया गया है कि वास्तविक ज्ञान का अनुभव शब्दों में नहीं किया जा सकता। इसके बाद पाठ में महात्मा का मन संघर्ष का भी वर्णन किया गया है, जिसमें वह अपने अतीत और व्यक्तिगत संबंधों के प्रति खिंचाव महसूस करते हैं। कहानी का एक अन्य महत्वपूर्ण हिस्सा महात्मा निरंजन के अतीत को दर्शाता है, जब वह एक बालिका किशोरी के साथ अपने बचपन की यादों में खो जाते हैं। यह यादें उन्हें संसार के सुख से जोड़ती हैं, जबकि वह एक तपस्वी जीवन जीने का प्रयास कर रहे हैं। पाठ का अंत महात्मा निरंजन के संघर्ष के साथ होता है, जब वह अपने तपस्वी जीवन और मोह के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रकार, यह पाठ न केवल जयशंकर प्रसाद के साहित्यिक योगदान को उजागर करता है, बल्कि मानव मन के जटिल भावनात्मक संघर्षों को भी दर्शाता है।


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