विक्रमोर्वशीयम | .Vikramorvasiyam

- श्रेणी: ग्रन्थ / granth संस्कृत /sanskrit
- लेखक: कालिदास - Kalidas
- पृष्ठ : 298
- साइज: 9 MB
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दो शब्द :
इस पाठ में विभिन्न पात्रों के बीच संवादों के माध्यम से प्रेम, विरह और मनोविज्ञान को दर्शाया गया है। उर्वशी और चित्रलेखा के बीच बातचीत होती है, जहां उर्वशी अपनी भावनाओं को व्यक्त करती है और चित्रलेखा उसकी सहायता करती है। पाठ में नंदनवन का उल्लेख है, जो प्रेम और सौंदर्य का प्रतीक है। उर्वशी अपने प्रेमी पुरूरवा से विरह का अनुभव कर रही है और अपने मन की व्यथा को चित्रलेखा के सामने रखती है। वह यह भी बताती है कि कैसे उसकी भावनाएं उसके शरीर पर असर डाल रही हैं और उसे संतापित कर रही हैं। चित्रलेखा उसे समझाती है कि प्रेम में ऐसा होना स्वाभाविक है और उसे धैर्य रखना चाहिए। इसके अलावा, पाठ में राजा और विदूषक के संवाद भी हैं, जहां वे प्रेम और जीवन की जटिलताओं पर चर्चा करते हैं। राजा अपनी प्रिय के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त करता है और विदूषक उसे प्रोत्साहित करता है। इस प्रकार, पाठ में प्रेम, विरह, और मानवीय भावनाओं की गहराई को दर्शाते हुए संवादों का एक समृद्ध tapestry प्रस्तुत किया गया है।
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