ह्रदय रोग की प्राकृतिक चिकित्सा | Hriday Rog Ki Prakritik Chikitsa

By: धर्मचंद सरावगी - Dharmachand Sarawagi
ह्रदय रोग की प्राकृतिक चिकित्सा | Hriday Rog Ki Prakritik Chikitsa by


दो शब्द :

इस पाठ में हृदय-रोगों की स्थिति, हृदय के कार्य और उसकी संरचना का विस्तार से वर्णन किया गया है। हृदय-रोगों की बढ़ती संख्या से चिंतित वैज्ञानिकों ने इसके अध्ययन के लिए कई महत्वपूर्ण अनुसंधान किए हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 40 वर्ष की आयु के बाद हृदय-रोग का खतरा बढ़ जाता है और आने वाले वर्षों में एक-तिहाई लोग इससे प्रभावित हो सकते हैं। प्राचीन काल में भी हृदय-रोगों का अस्तित्व था, लेकिन आज के समय में इसकी स्थिति अधिक गंभीर हो गई है। हृदय की चिकित्सा में अनेक वैज्ञानिक आविष्कार हुए हैं, जैसे रक्त-चाप मापने की विधि, एक्स-रे, और इलेक्ट्रोकाडियोग्राफी। इसके बावजूद, हृदय-रोगों की वृद्धि चिंता का विषय बनी हुई है। हृदय की संरचना और कार्य को समझाने के लिए इसे तीन भागों में बांटा गया है: अलिन्द, निलय और रक्त-नलिकाएँ। हृदय हर मिनट 72 बार धड़कता है और अपने कार्य को जीवनभर जारी रखता है। यह शरीर के लिए एक स्वचालित मशीन की तरह कार्य करता है, जो रक्त को शुद्ध करने और शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुँचाने का कार्य करता है। हृदय की मांसपेशियाँ अत्यधिक कार्यक्षम होती हैं और यह निरंतर कार्य करती रहती हैं। इस प्रकार, हृदय का कार्य और उसकी संरचना स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, और हृदय-रोगों की रोकथाम के लिए प्राकृतिक चिकित्सा और अन्य उपचार विधियों की आवश्यकता है।


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