पालि महाव्याकरण | Pali Mahavyakaran

- श्रेणी: Grammar/व्याकरण बौद्ध / Buddhism
- लेखक: भिक्षु जगदीश काश्यप - Bhikshu Jagdish Kashyap
- पृष्ठ : 656
- साइज: 25 MB
- वर्ष: 1950
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दो शब्द :
इस पाठ में "पालि महाव्याकरण" नामक पुस्तक का परिचय और उसके महत्व पर चर्चा की गई है। लेखक ने बताया है कि यह व्याकरण पुस्तक हिंदी पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है, क्योंकि इससे पालि साहित्य के गहन अध्ययन में सहूलियत होगी। उन्होंने उल्लेख किया है कि "महाबोधि सभा" ने पहले भी त्रिपिटक के कई ग्रंथों का हिंदी अनुवाद किया है, लेकिन अनुवाद मूल ग्रंथों का स्थान नहीं ले सकता। इसलिए, इस व्याकरण का अध्ययन अनिवार्य है। लेखक ने यह भी बताया है कि "पालि" शब्द का प्रयोग त्रिपिटक के लिए किया जाता था और समय के साथ यह नाम "पालि भाषा" के रूप में स्थापित हो गया। विभिन्न विद्वानों ने "पालि" शब्द की व्युत्पत्ति पर चर्चा की है, लेकिन यह स्पष्ट है कि यह शब्द हमेशा से किसी भाषा के लिए नहीं, बल्कि बुद्ध के उपदेशों के संदर्भ में प्रयोग होता था। लेख में पालि भाषा और वेदिक भाषा के बीच के भेद को भी स्पष्ट किया गया है। वेदिक भाषा को बोलचाल की भाषा के रूप में देखा गया है, जिसमें व्याकरण की कोई कठोरता नहीं थी। इसके विपरीत, पालि भाषा का विकास बुद्ध के उपदेशों को सुरक्षित रखने के लिए हुआ। कुल मिलाकर, यह पाठ पालि महाव्याकरण के महत्व, उसके विकास और पालि भाषा की विशेषताओं पर प्रकाश डालता है, जो बौद्ध साहित्य के अध्ययन के लिए आवश्यक है।
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