भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास | Bhartiya Svatantrata Andolan ka Itihas

By: हुमायूँ कबीर - Humayun Kabir


दो शब्द :

इस पाठ में ज्ञान, शक्ति और श्रेष्ठता की परस्पर संबंधों पर चर्चा की गई है। यह बताया गया है कि ज्ञान का अनुसरण शक्ति और श्रेष्ठता ने सदैव किया है, और यह मानव की सीखने की क्षमता है जिसने उसे अन्य प्राणियों में सर्वोपरि बनाया। इतिहास में कई उदाहरण हैं जहाँ ज्ञान को सीमित करने से समाज में कठिनाइयाँ आई हैं। ज्ञान का वितरण ही इसे बढ़ाता है, और औरंगजेब जैसे शासकों ने भी इसकी महत्ता को समझा था। औरंगजेब ने यह माना कि एक शासक को विभिन्न राष्ट्रों की विशेषताओं और उनके इतिहास का ज्ञान होना चाहिए। यदि उसे सही प्रशिक्षण मिला होता, तो संभवतः भारतीय इतिहास का रूप कुछ और होता। आधुनिक युग में, खासकर लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में, इतिहास का अध्ययन सभी नागरिकों के लिए आवश्यक हो गया है। यह ज़रूरी है कि नागरिकों को अपने देश और विश्व के प्रति जिम्मेदारी समझ में आए। पाठ में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास की लेखन प्रक्रिया का भी उल्लेख है। स्वतंत्रता के बाद यह निर्णय लिया गया कि आंदोलन के विभिन्न चरणों का एक प्रामाणिक और विस्तृत इतिहास लिखा जाए। इसके लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया, जिसमें विभिन्न विद्वानों को शामिल किया गया। इस समिति ने विभिन्न स्रोतों से सामग्री इकट्ठा की और यह सुनिश्चित किया कि इतिहास वस्तुनिष्ठ और निष्पक्ष हो। डी. ताराचंद को इस कार्य का नेतृत्व सौंपा गया, जिन्होंने भारतीय और यूरोपीय इतिहास का तुलनात्मक अध्ययन किया। पाठ में यह भी बताया गया है कि भारतीय स्वतंत्रता की कहानी मानव इतिहास में एक आकर्षक विषय है, जिसमें एक जाति ने अपनी पहचान और सम्मान को पुनः प्राप्त किया। स्वतंत्रता आंदोलन की कहानी को तीन खंडों में प्रस्तुत करने का निर्णय लिया गया, जिसमें भारत की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक अवस्थाओं का वर्णन होगा। यह संपूर्ण प्रक्रिया राष्ट्रीय आत्मसम्मान की पुनर्स्थापना और आधुनिक शिक्षा के प्रभाव को दर्शाती है।


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