संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास | Sanskrit Vyakaran Shastra ka Itihas

By: युधिष्ठिर मीमांसक - Yudhishthir Mimansak
संस्कृत व्याकरण शास्त्र का इतिहास | Sanskrit Vyakaran Shastra ka Itihas by


दो शब्द :

इस पाठ का सारांश भारतीय प्राचीन भाषा, विशेषकर संस्कृत और इसके व्याकरण के अध्ययन के संदर्भ में है। इसमें भारतीय प्राच्य संस्कृति के अनुसंधान, संरक्षण और प्रसार के उद्देश्य से स्थापित संस्थान का उल्लेख किया गया है। संस्थान का कार्य विभिन्न विभागों में विभाजित किया गया है, जिसमें प्राचीन साहित्य का अध्ययन, लेखन और प्रकाशन शामिल हैं। लेखक ने आधुनिक भाषाविज्ञान के दृष्टिकोण की आलोचना की है, विशेषकर संस्कृत को विश्व की आदि भाषा मानने के संदर्भ में। उन्होंने बताया कि आधुनिक भाषाविज्ञान में संस्कृत का अध्ययन संतोषजनक नहीं है और इस विषय में उनकी व्यक्तिगत खोजबीन और अनुभव साझा किए हैं। लेखक ने यह भी स्पष्ट किया है कि संस्कृत भाषा में मौलिक परिवर्तन नहीं हुआ है, बल्कि इसका प्रयोग सीमित हुआ है और कई शब्द अब लुप्त हो गए हैं। ग्रंथ के लेखन और मुद्रण की प्रक्रिया पर भी चर्चा की गई है। लेखक ने अपने अध्ययन के दौरान विभिन्न विद्वानों से मिली सहायता का उल्लेख किया है और अपने ग्रंथ के प्रकाशन में आई बाधाओं और संघर्षों का वर्णन किया है। अंत में, उन्होंने पाठकों से किसी भी मुद्रण संबंधी त्रुटियों के लिए क्षमा मांगी है और विद्या के प्रति अपने समर्पण का अभिव्यक्ति दी है।


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