अंगुत्तर निकाय | Anguttara Nikaya

- श्रेणी: धार्मिक / Religious साहित्य / Literature
- लेखक: भदंत आनंद कौसल्यायन - Bhadant Aanand Kausalyayan
- पृष्ठ : 346
- साइज: 7 MB
- वर्ष: 1912
-
-
Share Now:
दो शब्द :
इस पाठ का मुख्य विषय बौद्ध धर्म के सिद्धांतों और नैतिकता पर आधारित है, जिसमें जीवन के कर्मों और उनके फल के संबंध में चर्चा की गई है। बौद्ध धर्म के अनुयायी, भगवान बुद्ध के उपदेशों के माध्यम से यह समझते हैं कि उनके द्वारा किए गए कर्म, चाहे वे अच्छे हों या बुरे, उनके भविष्य को तय करते हैं। भगवान बुद्ध ने यह स्पष्ट किया है कि जो व्यक्ति अच्छे कर्म करता है, वह मृत्यु के बाद स्वर्ग में पुनर्जन्म पाता है, जबकि जो बुरे कर्म करता है, उसे नरक में पुनर्जन्म का सामना करना पड़ता है। उन्होंने यह भी बताया कि व्यक्ति की सोच, वाणी और क्रियाएँ तीनों ही महत्वपूर्ण हैं और इनका सही या गलत होना ही कर्मफल को तय करता है। पाठ में यह भी उल्लेख किया गया है कि अगर कोई व्यक्ति अपने दोष को स्वीकार नहीं करता है, या दूसरों के दोष को क्षमा नहीं करता है, तो वह मूर्ख है। इसके विपरीत, जो अपने दोष को समझता है और दूसरों को क्षमा करता है, वह ज्ञानी माना जाता है। इस प्रकार, यह पाठ बौद्ध धर्म के नैतिक सिद्धांतों को प्रस्तुत करता है, जो जीवन में सदाचार और आत्म-समर्पण को महत्व देते हैं। पाठ के अंत में ध्यान और आत्म-ज्ञान के महत्व को भी दर्शाया गया है, जो व्यक्ति को अपने जीवन में सही मार्ग चुनने में मदद करता है।
Please share your views, complaints, requests, or suggestions in the comment box below.