सिद्ध साहित्य | Siddh Sahitya

By: धर्मवीर भारती - Dharmvir Bharati


दो शब्द :

यह पाठ सिद्ध-साहित्य के अध्ययन और इसके प्रभावों पर केंद्रित है। सिद्ध-साहित्य का अध्ययन भारतीय साहित्य में एक महत्वपूर्ण विषय है, जिसकी शुरुआत 20वीं सदी के पहले दशक में हुई, जब विद्वान म. हरप्रसाद शाही ने नेपाल यात्रा के दौरान कुछ अपभ्रंश दोहे और चर्यापद प्राप्त किए। ये रचनाएँ चौरासी सिद्धों की परंपरा में आती हैं, और इनका महत्व तब और बढ़ा जब इन्हें संकलित कर एक ग्रंथ के रूप में प्रकाशित किया गया। हालांकि, हिंदी साहित्य में इस साहित्य पर ध्यान देने में काफी समय लगा। राहुल सांकृत्यायन ने इसे हिंदी में प्रस्तुत किया और इसके अध्ययन को बढ़ावा दिया। सिद्ध-साहित्य का अध्ययन केवल भाषा की दृष्टि से नहीं, बल्कि इसके दार्शनिक और काव्य पक्षों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है। यह साहित्य नाथों और संतों के साहित्य पर प्रभाव डालने वाला है, और इसके सिद्धांतों और साधनाओं का अध्ययन आवश्यक है। पाठ में यह भी बताया गया है कि सिद्धों के सिद्धांतों और साधना पद्धतियों का अध्ययन करते समय कई समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जैसे कि बौद्ध परंपरा से उनके विचारों का संबंध। इसके अलावा, सिद्धों का काव्यशैली, जो धार्मिक काव्य के रूप में महत्वपूर्ण है, पर भी ध्यान दिया गया है। अंत में, पाठ में यह भी कहा गया है कि इस विषय पर अधिक अध्ययन की आवश्यकता है और भविष्य में इसे और विकसित किया जा सकता है।


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