मुद्रा - शास्त्र | Mudra - Shastra

- श्रेणी: Vedanta and Spirituality | वेदांत और आध्यात्मिकता योग / Yoga
- लेखक: श्री प्राणनाथ विद्यालंकार - Shri Pranath Vidyalakarta
- पृष्ठ : 347
- साइज: 24 MB
- वर्ष: 1980
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दो शब्द :
इस पाठ में मुद्रा के राशिसिद्धांत और बैंकिंग प्रणाली की चर्चा की गई है। इसमें बताया गया है कि कैसे बैंकों में जमा धन का उपयोग किया जाता है और चेक जैसे वित्तीय उपकरणों के माध्यम से मुद्रा का आदान-प्रदान किया जाता है। सर्वप्रथम, पाठ में यह स्पष्ट किया गया है कि मुद्रा का उपयोग केवल शारीरिक धन तक सीमित नहीं है, बल्कि बैंकिंग प्रणाली में जमा धन और चेक जैसे साधनों के माध्यम से भी किया जाता है। बैंकों में जमा धन का एक हिस्सा सुरक्षित रखा जाता है, जबकि बाकी का उपयोग ऋण देने के लिए किया जाता है। इस प्रक्रिया में बैंक ग्राहकों के पैसे को एक दूसरे के बीच स्थानांतरित करते हैं, जिससे मुद्रा का प्रवाह तेज होता है। इसके बाद, पाठ में विभिन्न कारकों का उल्लेख किया गया है जो व्यापार और मुद्रा के प्रवाह को प्रभावित करते हैं, जैसे भौगोलिक भिन्नता, श्रम विभाजन, और पूंजी संचय। इन तत्वों के माध्यम से व्यापार की वृद्धि और उत्पादकता में सुधार होता है। इसके अतिरिक्त, पाठ में यह भी बताया गया है कि बैंक किस प्रकार से उधारी देते हैं और किन सिद्धांतों के आधार पर बैंकिंग का कार्य संचालित होता है। बैंक आमतौर पर संपत्ति और स्थिर पूंजी के आधार पर ऋण प्रदान करते हैं, जिससे अर्थव्यवस्था में स्थिरता बनी रहती है। अंत में, पाठ मुद्रा की क्रयशक्ति पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डालने वाले कारकों का विश्लेषण करता है, जैसे मानवीय आवश्यकताओं में विविधता और व्यापार की प्रणाली। यह स्पष्ट होता है कि मुद्रा का प्रवाह और उसका आदान-प्रदान विभिन्न आर्थिक गतिविधियों और कारकों पर निर्भर करता है, जो अंततः अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं।
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