वैदिक व्याकरण( द्वितीय भाग ) | Vedic Vyakaran( Bhag 2)

- श्रेणी: Grammar/व्याकरण धार्मिक / Religious वेद /ved
- लेखक: रामगोपाल शर्मा - Ramgopal Sharma
- पृष्ठ : 411
- साइज: 12 MB
- वर्ष: 1969
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दो शब्द :
यह पाठ वैदिक व्याकरण के द्वितीय भाग की भूमिका और उसके महत्व को प्रस्तुत करता है। लेखक ने इस ग्रंथ के लेखन और मुद्रण की प्रक्रिया पर चर्चा की है, जिसमें उन्हें विशेष संतोष का अनुभव हो रहा है। उन्होंने विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान प्रेस का आभार व्यक्त किया है, जिसने इस ग्रंथ के मुद्रण का कार्य कुशलता से किया। लेखक ने ग्रंथ में कुछ मात्रा और स्वरचिह्नों के टूटने की समस्याओं का उल्लेख किया है, लेकिन उन्होंने विश्वास दिलाया है कि इससे पाठकों को कोई भ्रांति नहीं होगी। ग्रंथ के अंत में एक सामान्य अनुक्रमणी भी जोड़ी गई है, जिसमें महत्वपूर्ण शब्दों का समावेश है। लेखक ने विद्यार्थियों और विद्वानों के प्रति आभार व्यक्त किया है, जिन्होंने पहले भाग पर अपनी समीक्षाएँ दी हैं और सुझाव दिए हैं। उन्होंने यह भी बताया है कि वैदिक व्याकरण का एक संक्षिप्त संस्करण विद्यार्थियों के लिए जल्दी प्रकाशित किया जाएगा। इसके अलावा, पाठ में विभिन्न लकारों और पुरुषों के अंतर्गत धातुओं के आख्यात रूपों का विस्तार से वर्णन किया गया है। पाणिनीय व्याकरण का उल्लेख करते हुए, लेखक ने बताया है कि वैदिक भाषा में धातुओं के रूपों की व्यवस्था को समझने के लिए विशेष नियमों का पालन किया गया है। अंत में, आधुनिक विद्वानों के दृष्टिकोण पर भी चर्चा की गई है, जिसमें उन्होंने भारतीय व्याकरण के सिद्धांतों को समझने एवं उनके अनुप्रयोग में स्वतंत्रता की आवश्यकता को स्वीकार किया है। इस प्रकार, पाठ वैदिक व्याकरण के अध्ययन के महत्व और इसकी जटिलताओं को स्पष्ट करता है।
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