कबीर और जायसी का रहस्यवाद तुलनात्मक विवेचन | Kabir Aur Jayasi Ka Rhashyavaad Tulnatmak Vivechan

By: गोविन्द त्रिगुणायत - Govind Trigunayat
कबीर और जायसी का रहस्यवाद तुलनात्मक विवेचन | Kabir Aur Jayasi Ka Rhashyavaad Tulnatmak Vivechan by


दो शब्द :

इस पाठ में कबीर और जायसी के रहस्यवाद की तुलना की गई है। लेखक डॉक्टर गोविन्द तिगुणायत ने दोनों कवियों की रहस्यात्मकता को उनके व्यक्तिगत दृष्टिकोण और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में विश्लेषित किया है। कबीर की रहस्यात्मकता भारतीय परंपरा से उत्पन्न हुई है और उनकी शिक्षाएँ स्वामी रामानंद से प्रभावित हैं। कबीर का रहस्यवाद भारतीय साधना और भक्ति की मूल भावनाओं को दर्शाता है, जिसमें लज्जा, मर्यादा और एकान्तप्रियता शामिल हैं। इसके विपरीत, जायसी का रहस्यवाद भारतीय होते हुए भी उसमें सूफी साधना और पारसी प्रभावों का मिश्रण दिखाई देता है। उनका दृष्टिकोण कुछ हद तक विलासप्रिय और भाव-प्रवण है, जो उन्हें कबीर से भिन्न बनाता है। पाठ में यह भी उल्लेख किया गया है कि कबीर और जायसी दोनों ने अपने-अपने समय में रहस्यवाद को एक विशेष दिशा दी, लेकिन उनके संदेशों और भावनाओं में भिन्नताएँ हैं। लेखक ने यह भी बताया है कि रहस्यवाद का उदय मानवता के प्रारंभिक काल से हुआ है और यह भारतीय साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। रहस्यवाद के विभिन्न रूपों का उल्लेख करते हुए, लेखक ने वेदों, उपनिषदों और योग की धाराओं में भी रहस्यात्मकता को देखा है। अंत में, लेखक ने कबीर और जायसी के रहस्यवाद पर अपनी विचारधारा को प्रस्तुत किया है और इस विषय पर आगे के अध्ययन के लिए प्रेरित किया है।


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