वैराग्य के पथपर | Vairagya Ke Pathpar

- श्रेणी: Vedanta and Spirituality | वेदांत और आध्यात्मिकता साहित्य / Literature
- लेखक: श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती - Shri Swami Shivanand Sarasvati
- पृष्ठ : 142
- साइज: 3 MB
- वर्ष: 1943
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दो शब्द :
इस पाठ का मुख्य विषय वैराग्य है, जिसमें वैराग्य की आवश्यकता, इसके लाभ और साधन पर चर्चा की गई है। लेखक ने भगवान बुद्ध, राजा भत्त हरि और राजा गोपीचंद के उदाहरणों के माध्यम से यह बताया है कि कैसे धन, सम्पत्ति और राज्य का परित्याग करके अमरत्व और अनंत सुख की प्राप्ति की जा सकती है। वैराग्य को भोग और विलास के जीवन से मुक्त होने के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पाठ में यह स्पष्ट किया गया है कि भोग में लिप्त रहने पर अनेक प्रकार के भय, जैसे रोग, सामाजिक पतन और अनादर का सामना करना पड़ता है। इसके विपरीत, वैराग्य से निर्भयता प्राप्त होती है और यह जीवन के सच्चे लक्ष्यों की ओर ले जाता है। इसके अलावा, वैराग्य के माध्यम से मनुष्य को आत्मज्ञान और आत्मानंद की प्राप्ति करने के लिए प्रेरित किया गया है। पाठ में चेतावनी दी गई है कि भोग के पीछे भागते रहने से मनुष्य का जीवन दुखों से भरा होता है और उसे अपनी आत्मा की पहचान करनी चाहिए। अंत में, लेखक ने पाठकों को वैराग्य के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया है, यह बताते हुए कि केवल बाह्य वस्तुओं में सुख की तलाश करना व्यर्थ है। वास्तविक सुख आत्मा की गहराइयों में है, जिसे खोजने के लिए ध्यान, योग और भक्ति का मार्ग अपनाना चाहिए। पाठ का उद्देश्य मानव जीवन को सच्चे और स्थायी सुख की ओर अग्रसर करना है।
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